ज्यादा के चक्कर में फंसी कांग्रेस!

Updated on: 16 October, 2019 11:01 AM
मेरठ सपा से सियासी दोस्ती कांग्रेस के लिए कमजोर दांव साबित हो रही है। ज्यादा सीट के चक्कर में कांग्रेस ने कई कमजोर सीटें भी ले ली है। अब इन सीटों में वह बदलाव की कोशिश में है। लंबी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस का सपा से गठबंधन हुआ। 105 सीटें कांग्रेस को मिली। वेस्ट यूपी में कांग्रेस का बड़ा जनाधार नहीं है। उसके बाद भी पहले दो चरणों में 43 सीट कांग्रेस के हिस्से में आई। कुल मिलाकर पार्टी वेस्ट यूपी में करो या मरो की हालत में है, कंग्रेस को मिली ज्यादातर सीटों पर उसे कमजोर आंका जाता रहा है। मेरठ में ही कैंट सीट कांग्रेस के खाते में गई है। वहां पिछले तीस साल से कांग्रेस का कोई विधायक नहीं बना। अजित सिंह सेठी कांग्रेस के आखरी विधायक थे। उस सीट पर तीन चुनाव हार चुके रमेश धींगड़ा को उतारा गया है। धीगड़ा प्रदेशाध्यक्ष राजबब्बर के करीबी हैं। मेरठ दक्षिण सीट पहले खरखौदा के नाम से जानी जाती थी, बीस साल पहले राजेंद्र शर्मा वहां से कांग्रेस के आखरी विधायक बने थे। उसके बाद यह सीट लगातार बीजेपी, व बीएसपी के पास है। यहां से कांग्रेस ने बाहरी उम्मीदवार को टिकट दिया है। बुलंदशहर की स्याना सीट पिछली बार कांग्रेस के टिकट पर दिलनवाज खां ने जीती थी। लेकिन यह जीत दिलनवाज के पारिवारिक संबध और आरएलडी के साथ होने के कारण मिली थी। वहां कांग्रेस का कोई जनाधार नहीं हैं। इस बार पार्टी में कभी नहीं रहने वाले और नए चेहरे को प्रत्याशी बनाया गया है। यहीं हाल गाजियाबाद की लोनी व मथुरा की सुरक्षित सीट बलदेव और अलीगढ़ की सुरक्षित सीट खैर की है। वहां पार्टी मजबूत नहीं है। कांग्रेस का संगठन भी नहीं चाहता है कि वहां पार्टी को फजीहत करने भर के लिए लड़ाए। इसके अलावा भी कई सीटों को लेकर पार्टी परेशान है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी अब सपा से वेस्ट की कुछ सीटें बदलकर अन्य सीट देने का आग्रह कर रही है।
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