अमेरिका-चीन में तनातनी, एशियाई देशों के बीच अपनी धाक जमाने की फिराक में भारत

Updated on: 16 October, 2019 11:07 AM

इंद्राणी बागची, नई दिल्ली
अमेरिका-चीन का रिश्ता तनाव से बोझिल हो रहा है। ऐसे में एशियाई देश संतुलन साधने वाली शक्तियों की तलाश में जुट गए हैं जो आक्रामक चीन और अनिश्चित अमेरिका- दोनों के खतरों को बेअसर कर सके। अगले कुछ सप्ताह और महीनों में भारत एशियाई देशों के साथ पहले से मजबूत तालमेल को और बढ़ाने की योजना पर काम करने जा रहा है ताकि विभिन्न गठजोड़ों के जरिए यह खुद को इलाके की नेतृत्वकारी ताकत के रूप में उभार सके।
वियतनाम के विदेश मंत्री फाम बिन मिन और उप-राष्ट्रपति आने वाले सप्ताह में भारत दौरे पर आएंगे। मलयेशियाई प्रधानमंत्री नजीब रजाक की भी भारत आने की संभावना है, वहीं भारत इसी साल ऑस्ट्रेलियाई पीएम मैलकम टर्नबुल की भी मेजबानी कर सकता है। इधर, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भी अप्रैल में भारत आ सकती हैं, जबकि विदेश सचिव एस जयशंकर अभी श्री लंका, चीन और बांग्लादेश के दौरे पर हैं। उनका यह दौरा पड़ोसी देशों के साथ राब्ता कायम रखने के साथ-साथ इन देशों के साथ मजबूत रिश्तों के जरिए एशिया में भारत की भूमिका को विस्तार देने की कवायद के लिहाज से देखा जा सकता है।
ट्रंप प्रशासन के शुरुआती दिनों में इलाकाई देशों के लिए भ्रामक संकेत गए। सामान्य धारणा है कि अमेरिका-चीन के रिश्ते पर बहुत ज्यादा बर्फ जमने जा रही है और इसका असर हरेक इलाकाई देशों पर पड़ेगा। ट्रंप और उनके शीर्ष मंत्रीमंडलीय सहयोगियों ने चीन की ओर से महाद्वीप के निर्माण पर और ज्यादा टकराव के रुख की ओर इशारा किया है। ट्रंप प्रशासन ने पूर्ववर्ती ओबामा प्रशासन के ट्रांस-पसिफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) से हटते हुए स्पष्ट कर दिया कि खासकर व्यापार और शुल्कों पर उसका रवैया ज्यादा आक्रामक रहेगा। दरअसल, ट्रंप प्रशासन दूसरों की भांति यह नहीं मानता कि टीपीपी से निकलने पर चीन को स्ट्रैटिजिक स्पेस मिल जाएगा।

उसे लगता है कि चीन को काबू में रखने में टीपीपी का सीमित असर रहा है। ट्रंप प्रशासन को लगता है कि एशियाई देश किसी-न-किसी रूप में पेइचिंग के इरादों से चिंतित हैं और वह इसके खतरे से बचने का रास्ता तलासेंगे। दूसरी तरफ, अमेरिका-चीन के रिश्ते में बदलाव की इच्छा जाहिर करने के बाद ट्रंप ने 'एक चीन' की नीति पर विश्वास जताया। विदेश सचिव रेक्स टिलर्सन ने दक्षिण चीन सागर पर अपने बयान में नरमी दिखायी और उत्तरी कोरिया के हालिया मिसाइल परीक्षण पर भी वॉशिंगटन ने कुछ कठोरता नहीं दिखायी।

इलाकाई ताकतों के लिए इसके दो मायने हैं- उन्हें पता है कि उन्हें चीन से क्या उम्मीद करनी चाहिए और उन्हें चिंता भी है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि नए अमेरिकी प्रशासन से किस तरह की उम्मीद की जानी चाहिए। ये दोनों बातों में चिंता की बराबर वजहें हैं। फिलीपीन के सुरक्षा सचिव ने पिछले सप्ताह एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर चीन ने यह भांप लिया कि उसे कोई रोकने वाला नहीं है तो वह मनीला से 300 किमी दूर स्कारबोरो शोल में निर्माण कर सकता है। उन्होंने कहा, 'अगर हम उन्हें नहीं रोकें तो वो निर्माण कर लेंगे।' उन्होंने आगे कहा, यह बहुत परेशान करने वाली बात है क्योंकि यह हमसे बहुत नजदीक है।' फिलीपीन्स एशिया में अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी है।

वियतनाम को खासकर टीपीपी के खात्मे से ठगा महसूस हो रहा है। अनियंत्रित चीन दक्षिण चीन सागर में फिर से तनाव बढ़ा सकता है, जबकि जापान और भारत के बीच सहयोगात्मक रिश्ते कायम रहेंगे। ऐसे में वियतनाम की नजर इस पर है कि अमेरिका इलाके में किस तरह की भूमिका निभाना चाहता है।

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