अयोध्या विवादः 150 साल, 9 कोशिशें, परवान नहीं चढ़ी 3 पीएम की पहल

Updated on: 22 April, 2019 06:29 AM
अयोध्या में राम मंदिर विवाद को कोर्ट के बाहर निपटाने की अब तक 9 बार असफल प्रयास किए जा चुके हैं, 150 साल से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी इसका कोई समाधान नहीं हो पाया है। इस विवाद को सुलझाने के लिए 3 प्रधानमंत्रियों ने भी पहल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को टिप्पणी की थी कि सभी पक्ष आपस में मिलकर कोर्ट के बाहर इस मामले को सुलझाएं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि सभी पक्षों को इस मुद्दे को सुलझाने के नए प्रयास करने के लिए मध्यस्थ चुनने चाहिए। उन्होंने ये भी टिप्पणी की कि अगर जरूरत पड़ी तो मामले के निपटान के लिए कोर्ट द्वारा प्रधान मध्यस्थ भी चुना जा सकता है। राम मंदिर से जुडे़ इस विवाद को सुलझाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्रियों अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर और पी वी नरसिंह्म राव ने पहल की थी। सबसे पहले ब्रिटिश शासन काल में 1859 में इस विवाद को सुलझाने का प्रयास हुआ था। एक नजर डालते हैं अब तक के हुए इन प्रयासों पर- 1- 1859 में जब राम जन्मभूमि स्थल पर कब्जे को लेकर विवाद हुआ तो ब्रिटिश प्रशासन ने बाड़ लगा दिया था, अंदर का हिस्सा मुस्लिमों और बाहर का हिस्सा हिन्दूओं को मिला। लेकिन यह व्यवस्‍था ज्यादा दिनों तक नहीं चली क्योंकि महंत रघुवर दास ने 1885 में राम चबूतरे पर एक छत्र बनाने की अनुमति मांगने को लेकर याचिका डाली। 2- 1990 में पीएम चंद्रशेखर ने विवाद के समाधान की कोशिश की जब विश्व हिन्दू परिषद के स्वयंसेवकों ने बाबरी मस्जिद के आशिंक हिस्से को क्षतिग्रस्त कर दिया। लेकिन वह प्रयास असफल रहा। 3- 6 दिसंबर 1992 को विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना और बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज्यादा लोग मारे गए। इसके 10 दिनों के बाद तत्कालीन पीएम राव ने इसकी जांच के लिए लिब्राहन आयोग का गठन कर दिया। 17 साल बाद जून 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। लेकिन यह रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं की गई। 4- जून 2002 में पीएम वाजपेयी ने अपने कार्यालय में अयोध्या सेल का गठन किया और शत्रुघ्न सिंह को हिन्दू और मुस्लिम नेताओं से बातचीत की जिम्मेदारी सैंपी। लेकिन यह पहल महज घोषणा तक ही सीमित रह गई। 5- 26 जुलाई 2010 इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सभी पक्षों को शांतिपूर्वक इस मामले को सुलझाने को कहा, पर किसी ने रूचि नहीं ली। कोर्ट ने कहा कि 24 सितंबर को फैसला सुनाया जाएगा। 6- 23 सितंबर 2010 को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को कोर्ट के बाहर सुलझाने की याचिका दायर की गई। तब कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और इलाहाबाद हाईकोर्ट को अपना आदेश देने को कहा। 7- 24 फरवरी 2015 को इस मामले में मुस्लिमों के पक्षकार मोहम्मद हासिम अंसारी ने अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञान दास से मुलाकात की और इस विवाद के हल के लिए नए प्रस्ताव पर चर्चा की। इस प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने की योजना बनाई। लेकिन कोर्ट के बाहर समाधान की कोशिश बेकार रही। 8- अयोध्या में 10 अप्रैल 2015 को दोनों ही ओर के पक्षकारों ने विवाद के समाधान के लिए एक बार फिर बातचीत शुरू की। हिन्दुओं के मुख्य पक्षकार हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणी ने मुस्लिम पक्षकारों से मुलाकात की। लेकिन पहली ही बैठक के बाद यह प्रयास भी बेनतीजा रहा। 9- 31 मार्च, 2016 को दोनों ही पक्षों के नेता फिर मिले। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने हाशिम अंसारी से मिले। इस पहल में कोई बात आगे बढ़ती कि हाशिम अंसारी का इंतकाल हो गया
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