शर्मनाक: 1200 रुपए की नौकरी करने को मजबूर हैं शहीद के पिता

Updated on: 20 October, 2019 12:37 PM

वर्ष 2010 में जब शशांक सिंह का राजपूताना राइफल्स में चयन हुआ, तो अरुण सिंह का सीना फूले नहीं समा रहा था। बेटे के फौज में भर्ती होने की खबर मिठाई के साथ गांव भर में बताते फिरे थे।

लेकिन पिछले साल नवंबर में जब कश्मीर से उनकी शहादत की खबर आई तो लगा जैसे सीने पर किसी ने कोई बड़ा पत्थर रख दिया हो। जिस बेटे ने बुढापे का सहारा बनना था, उसी के शव को कंधा देने की ताकत जुटाना तो मुश्किल था ही, लेकिन उससे भी ज्यादा कठिन जिंदगी की गाड़ी को आगे चलाना था।

छह महीने बीत जाने के बाद अब गुजारे के लिए 1200 प्रति माह की नौकरी करनी पड़ रही है। पेंशन का इंतजार है कि हर दिन के साथ लंबा होता जा रहा है। प्रशासन के अधूरे वादे भी पूरे होने की बाट जोह रहे हैं। शशांक तीन भाइयों एवं एक बहन में सबसे छोटे थे।

नसीरूद्दीनपुर गांव के शहीद शशांक सिंह के पिता अरुण सिंह बताते हैं कि गैस एजेंसी के साथ ही गांव का नाम शशांकपुरम रखने का वादा भी अधूरा रह गया। अरुण सिंह को इस बात मलाल है कि जन प्रतिनिधियों ने अपने वादे पूरे नहीं किए। पेंशन भी नहीं दी गई।

सांसद निधि से मैरिज हॉल बनना था और गांव का नाम शशांकपुरम होना था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हो पाया है। डीएम संजय खत्री हालांकि विश्वास दिलाते हैं कि सब वादे पूरे होंगे।

भाई में बहन में सबसे छोटे थे शशांक

2010 में राजपुताना राइफल में भर्ती
तीन भाई एक बहन में सबसे छोटे
57 राष्ट्रीय रायफल में तैनात थे
16 को माछिल सेक्टर में आतंकियों को लोहा लेते हुए शहीद हो गए।

क्या मिली मदद
25 लाख रुपये प्रदेश सरकार ने और 5 लाख रुपये सपा ने दिए’   
1 लाख एमएलसी विशाल चंचल ने दिए। हैंडपंप, सोलर लाइट भी।

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