एक सुंदर रानी की कहानी, जिसके इस धोखे ने राजा को बना दिया साधु

Updated on: 25 June, 2019 12:22 PM

इंदौर।इस बार सिंहस्थ में अाने वालो करोड़ों लोग 2500 वर्ष पुरानी विश्वप्रसिद्ध राजा भृर्तहरि की गुफा को अंदर से नहीं देख पाएंगे। व्यवस्था और गुफा के संकरे होने की वजह से इसका संचालन कर रहे नाथ संप्रदाय ने सिंहस्थ में गुफा में आम लोगों को प्रवेश नहीं देने का निर्णय लिया है। पढ़ें, गुफा और राज भृर्तहरि के तपस्वी बनने की कहानी...

क्यों खास है ये गुफा, क्या है इसके अंदर
- गुफा नंबर एक में राजा भृर्तहरि व नंबर दो में उनके भांजे राजा गोपीचंद की तपस्थली है।
- काले पत्थरों, मिट्टी से बनी ये गुफाओं में अंदर जाने के मार्ग काफी संकरे हैं।
- लोग झुककर और बैठकर जाते हैं। हवा की कमी है। कोई भी व्यक्ति ज्यादा देर गुफा नहीं रह सकता है।
- गर्मी में गुफा में दर्शन कठिन होते हैं।
- मान्यता है कि 2500 वर्ष पहले गुरु गोरखनाथ व बाद में राजा भृर्तहरि ने 12 वर्ष गुफा में तपस्या की।
- भृर्तहरि गुफा उज्जैन के गादीपति योगी रामनाथ महाराज ने बताया कि गुफा के बाहर बड़ी स्क्रीन पर लोग लाइव दर्शन कर सकेंगे।
- सिंहस्थ में प्रतिदिन संत-महंत अंदर जाकर नियम से आरती-पूजा करेंगे।

यह है राजा भृर्तहरि के तपस्वी बनने के पीछे की चर्चित कहानी...
उज्जैन के प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य के भाई का नाम राजा भतृहरि था। भर्तृहरि बहुत ज्ञानी थे, लेकिन दो पत्नियां होने के बावजूद भी वे पिंगला नामक अति सुंदर राजकुमारी पर मोहित गए। उन्होंने उसे तीसरी पत्नी बना लिया। वे हर काम पिंगला के इशारों पर काम करने लगे। पिंगला इसका फायदा उठाकर व्यभिचारिणी हो गई।

वह कोतवाल से प्रेम करने लगी। जब छोटे भाई विक्रमादित्य को यह बात मालूम हुई और उन्होंने बड़े भाई को ये बात बताई, लेकिन उन्होंने विक्रमादित्य को चरित्रहीन मान उन्हें ही राज्य से निकाल दिया।
ऐसे उजागर हुई सच्चाई
कुछ समय बाद एक तपस्वी ब्राह्मण ने वरदान में मिला अमर फल (जिसे खाने वाला अमर हो जाता है) राजा को भेंट किया। राजा ने यह फल पिंगला को दे दिया, ताकि वह अमर हो जाए। लेकिन पिंगला ने यह फल अपने प्रेमी को दे दिया। प्रेमी ने यह फल एक वेश्या को दे दिया। वेश्या यह सोचकर कि इस अमर फल को खाने से जिंदगी भर वह पाप कर्म में डूबी रहेगी, राजा को भेंट कर दिया।
राजा ने वेश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वेश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भृतहरि ने कोतवाल से पूछा तो उसने बताया कि यह फल उसे रानी ने दिया था। यह सुन राजा समझ गए कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। इससे भृतहरि के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भृतहरि ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी।

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