अड़े यूपी के शिक्षामित्र: आज से स्कूल नहीं जाएंगे,योगी सरकार से कानून बनाने की मांग, SC में डालेंगे पुनर्विचार याचिका

Updated on: 15 November, 2019 04:56 PM

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 1.78 लाख शिक्षामित्रों की सहायक अध्यापक के रूप में नियमितीकरण को सिरे से गैरकानूनी ठहराया। साथ ही भारी राहत देते हुए उन्हें तत्काल हटाने से मना कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षामित्रों को शिक्षक भर्ती की औपचारिक परीक्षा में बैठना होगा और उन्हें लगातार दो प्रयासों में यह परीक्षा पास करनी होगी। शिक्षामित्रों ने हार न मानते हुए पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा है कि अब राज्य सरकार चाहे तो वह नियम बनाकर शिक्षामित्रों को पूर्ण अध्यापक का दर्जा दे सकती है। समायोजित शिक्षामित्रों ने बुधवार से स्कूल नहीं जाने का ऐलान किया है।

आदर्श शिक्षा मित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष जितेन्द्र शाही ने कहा कि फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। अब हमारी निगाहें सरकार की तरफ है। यदि सरकार कोई सकारात्मक घोषणा नहीं करती तो हम कार्य बहिष्कार जारी रखेंगे। उन्होंने सरकार से अपील की कि वह कोई सकारात्मक कदम उठा कर हमारे भविष्य को सुरक्षित करे। अगर जलीकट्टू के आयोजन के लिए बिल लाया जा सकता है तो शिक्षामित्रों को समायोजित करने के लिए भी सरकार विशेष प्राविधान कर सकती है।

वहीं उप्र दूरस्थ बीटीसी शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल यादव ने कहा है कि हम वरिष्ठ अधिवक्ताओं की मदद ले रहे हैं। शिक्षामित्र संविधान और सरकार पर भरोसा रखे। निर्णय हमारे पक्ष में नहीं आया है लेकिन सभी शिक्षामित्रों से अपील है कि वे हिम्मत न हारे और निराशा में कोई गलत कदम न उठाए। सरकार से भी हम वार्ता करेंगे और केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ संपर्क करेंगे। कोई न कोई हल जरूर निकलेगा। बेसिक शिक्षा विभाग के अपर सचिव राज प्रताप सिंह ने कहा है कि हम फैसले का अध्ययन कर रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों की राय लेने के बाद ही आगे कार्रवाई होगी।
फैसले में खामी नहीं:

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उत्तर प्रदेश को चार साल से मथ रहे इस विवाद की समाप्ति हो गई। जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और यू.यू. ललित की विशेष पीठ ने मंगलवार को यह आदेश देते हुए कहा कि शिक्षामित्रों के नियमितीकरण को गैरकानूनी ठहराने वाले 2014 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में कोई खामी नहीं है। राज्य को आरटीई एक्ट की धारा 23(2) के तहत शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यताओं को घटाने का कोई अधिकार नहीं है। आरटीई की बाध्यता के कारण राज्य सरकार ने योग्यताओं में रियायत देकर शिक्षामित्रों को नियुक्ति दी थी। पीठ ने कहा कि कानून के अनुसार ये कभी शिक्षक थे ही नहीं, क्योंकि ये योग्य नहीं थे।
वर्ष 2011 से बंधी आस टूट गई

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद प्रदेश के पौने दो लाख शिक्षा मित्र मायूस हैं। अब उनकी निगाहें बीजेपी सरकार पर हैं कि उनके लिए क्या राह निकालती है। शिक्षा मित्रों का समायोजन रद्द होने की खबर आते ही उनके घरों में मायूसी फैल गई। 2011 से 2017 तक के सफर में वह फिर से वहीं पहुंच गए हैं जहां से वे चले थे। मौजूदा समय में 1.38 लाख शिक्षा मित्र सहायक अध्यापक बन चुके हैं और 25 हजार से ज्यादा अब भी शिक्षा मित्र के रूप में मानदेय ले रहे हैं।

 शिक्षामित्र आज सड़क पर हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह सियासत और इसके दांवपेंच हैं। तत्कालीन सपा सरकार ने शिक्षामित्रों को समायोजित करने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया और भुगतना शिक्षामित्रों को पड़ रहा है। वर्ष 2010 तक यह शिक्षामित्र मानदेय पाकर ही खुश थे। वे 3500 रुपये के मानदेय को बढ़ाने की मांग भले ही करते रहे हो लेकिन पक्की नौकरी का सपना नहीं था। शिक्षा का अधिकार कानून के बाद तत्कालीन बसपा सरकार ने इन्हें प्रशिक्षित करने का फैसला लिया तो समाजवादी पार्टी ने 2012 के विधानसभा चुनाव में उन्हें सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्त करने को घोषणापत्र का हिस्सा बनाया। तत्कालीन सपा सरकार ने वायदा निभाया भी लेकिन नियमों की अनदेखी भारी पड़ी। हालांकि उस समय कई बार शिक्षा मित्रों के लिए अलग से टीईटी करवाने पर बात उठी लेकिन शिक्षामित्रों के नेता इसके लिए राजी नहीं थे।

2014 से लगातार नियमित 30 हजार रुपये से ज्यादा वेतन ले रहे शिक्षामित्र अब खाली हाथ हैं। जब उनका समायोजन हुआ था तब वे 3500 रुपये मानदेय पा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि राज्य सरकार चाहे तो उन्हें शिक्षामित्र के पद पर रख सकती है। हाल ही में शिक्षामित्रों का मानदेय बढ़ा कर 10 हजार रुपये किया गया है। लेकिन बजट में केवल 26 हजार उन शिक्षामित्रों के लिए व्यवस्था की गई है जो समायोजित नहीं हो पाए थे।

शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के तहत कक्षा 1 से 8 तक अप्रशिक्षित शिक्षक स्कूलों में नहीं पढ़ा सकते। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने शिक्षकों के मानक तय कर दिए हैं। इसमें प्रशिक्षित स्नातक को अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी)पास करने पर ही शिक्षक पद के योग्य माना जाएगा। पहले से पढ़ा रहे शिक्षकों के लिए भी प्रशिक्षण प्राप्त करना अनिवार्य होगा लेकिन उन्हें टीईटी से छूट दी जाएगी। शिक्षामित्रों को भी इसी नियम के तहत 2011 से दूरस्थ प्रणाली से दो वर्षीय प्रशिक्षण दिलवाया गया। 2014 में टीईटी से छूट देते हुए सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति देने की प्रक्रिया शुरू की गई। यहीं पर नियमों से खेल हुआ क्योंकि नई नियुक्ति के लिए टीईटी अनिवार्य है। सहायक अध्यापक के पदों पर समायोजन के नाम पर शिक्षमित्रों को नई नियुक्ति दी गई।
इलाहाबाद कोर्ट ने कहा था 'नियुक्तियां असंवैधानिक'
इलाहाबाद कोर्ट ने कहा था कि शिक्षामित्रों की नियुक्तियां संवैधानिक के खिलाफ हैं क्योंकि आपने बाजार में मौजूद प्रतिभा को मौका नहीं दिया और उन्हें अनुबंध पर भर्ती करने के बाद उनसे कहा कि आप अनिवार्य शिक्षा हासिल कर लो। पीठ ने कहा कि यह बैकडोर एंट्री है जिसे उमादेवी केस (2006) में संविधान पीठ अवैध ठहरा चुकी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2015 शिक्षामित्रों की नियुक्तियों को अवैध ठहरा दिया था जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर में इस आदेश को स्टे कर दिया था।

अच्छी मंशा आंखों का धोखा है
कोर्ट ने कहा था कि हम मंशा पर सवाल नहीं उठा रहे हैं हम यह पूछ रहे हैं कि आपने शिक्षामित्रों को योग्यता शिक्षा हासिल (बीएड,बीटीसी, दूरस्थ बीटीसी और टीईटी) करने के लिए किस नियम के तहत अनुमति दी। क्या आपने इसके लिए कोई विज्ञापन निकाला था क्या कोई चयन प्रक्रिया तय की थी। आपकी कल्याणकारी मंशा कुछ नहीं, आंखों का धोखा मात्र है, आपने नियमों के विरुद्ध भर्ती की है। जस्टिस ललित ने पूछा आप इस नतीजे पर किस आधार पर पहुंचे कि प्रदेश में पौने दो लाख शिक्षामित्रों की जरूरत है और आपने मार्केट में मौजूद प्रतिभा को महरूम कैसे किया। क्या इसे निष्पक्ष प्रतियोगिता कहा जा सकता है। आप कह रहे हैं इसे किसी ने चुनौती नहीं दी। जब तक ये अनुबंध था किसी को समस्या नहीं थी लेकिन जब आप नियमित करने लगे तक समस्या हुई। बिना विज्ञापन आप नियमित कैसे कर सकते हैं।

कोर्ट मामले को आज की समाप्त करना चाहता था लेकिन कुछ शिक्षामित्रों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी ने वह कुछ बहस करेंगे। उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को बचकाना बताया और कहा कि उन्होंने यह नहीं देखा कि शिक्षामित्र रखने को उद्देश्य दूरदराज के क्षेत्रों में शिक्षा देना था। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने फैसला देते समय एक भी शिक्षामित्र को नोटिस नहीं दिया था। कोर्ट का समय पूरा होने के कारण बहस पूरी नहीं हो सकी इसलिए कोर्ट ने मामला कल तक के लिए स्थगित कर दिया।

दूरदराज शिक्षा देने के लिए की थी भर्ती

यूपी सरकार ने कहा कि 1999 में शिक्षामित्रों की भर्ती प्रदेश के दूरदराज के क्षेत्रों में बालकों को बेसिक शिक्षा देने के लिए की गई थी। यह एक कल्याणकारी कदम था जिसके पीछे कोई गलत मंशा नहीं थी। उन्होंने कहा कि 22 साल से चल रही यूपी सरकार की इस नीति को चुनौती नहीं दी है। जिन्होंने चुनौती दी है उनकी संख्या लगभग 200 है और उन्हें सरकार नौकरी में लेने को तैयार है।

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