अयोध्या विवाद: SC में 5 दिसंबर के बाद नहीं टलेगी सुनवाई, जानें 5 खास बातें

Updated on: 19 October, 2019 11:10 AM

विवादित ढांचे के मालिकाना हक विवाद में शामिल दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं होने के चलते शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस अहम मामले पर सुनवाई आगे बढ़ा दी। कोर्ट ने पांच दिसंबर से अंतिम सुनवाई करने का फैसला लिया। साथ ही स्पष्ट किया कि भविष्य में किसी भी परिस्थिति में इसमें कोई स्थगन नहीं दिया जाएगा, अदालत सुनवाई को नहीं टालेगी।

जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने कहा कि हम मालिकाना हक के दावों पर जनहित याचिका की तरह सुनवाई नहीं करेंगे। पहले हम तय करेंगे कि विवादित स्थल पर किसका अधिकार है और उसके बाद पूजा के अधिकार इत्यादि के मुद्दों पर विचार किया जाएगा। पीठ ने यह स्पष्ट तब किया जब सुब्रमण्यम स्वामी के मुख्य मामले में पक्षकार नहीं होने के बावजूद जल्द सुनवाई की मांग पर सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड समेत अन्य पक्षों ने आपत्ति जताई। बोर्ड ने पीठ से कहा कि 10 हजार से भी ज्यादा पन्ने हैं जिनका अनुवाद अब तक नहीं किया गया है। यह दस्तावेज हिंदी, संस्कृत, पारसी, अरबी और उर्दू समेत आठ भाषाओं में हैं। डेढ़ घंटे से भी ज्यादा समय तक चली सुनवाई में विभिन्न पक्षकारों द्वारा दाखिल दस्तावेज दूसरे पक्ष को नहीं मुहैया कराए जाने और अंग्रेजी में अनुवाद नहीं होने समेत अन्य पहलुओं पर पीठ ने गौर किया।

पक्षकार 5 दिसंबर से ब्योरा पेश करें
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि दावा करने वाले पक्षकार 5 दिसंबर से तीन दिन तक शुरुआती ब्योरा पेश करेंगे। इसके बाद मामले का निपटारा समयबद्ध तरीके से किया जाएगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस अहम मामले में आगे किसी भी सूरत में किसी को स्थगन नहीं दिया जाएगा।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि विभिन्न पक्षकार दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद तीन माह में कराने के लिए समय देने को कहा, लेकिन पक्षकारों ने कहा कि दस्तावेजों की तादाद अधिक है और उन्हें कम से कम चार माह इसके लिए चाहिए होंगे। इस पर अदालत ने पूछा कि आप लोग पिछले सात साल से क्या कर रहे थे। हालांकि बाद में पीठ ने कहा कि संबंधित पक्षों को अदालत में दाखिल किए गए दस्तावेज मुहैया कराने और अनुवाद के लिए उचित समय प्रदान करते हैं। साथ ही पीठ ने यूपी सरकार को मौखिक सबूतों के अनुवाद की जिम्मेदारी सौंपी और कहा कि राज्य सरकार उन्हें शीर्ष अदालत में दाखिल करे।

सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 13 अपील लंबित हैं। हाईकोर्ट ने 2.73 एकड़ भूमि के मालिकाना हक विवाद में जमीन को रामलला विराजमान, सुन्नी वक्फ और निर्मोही अखाड़ा को तीन हिस्सों में बांट दिया था। हाल ही में शीर्षस्थ अदालत ने जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व में तीन सदस्यीय विशेष पीठ का गठन किया था।

सुनवाई के अंतिम दौर में शुक्रवार को यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड की 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील और मुख्य मामले में दाखिल हलफनामे का जिक्र भी आया। सुन्नी वक्फ ने उस पर विरोध भी जताया और कहा कि शिया वक्फ इस मामले में पक्षकार नहीं है। हालांकि शिया वक्फ की ओर से पेश हुए वकील ने इसका खंडन करते हुए कहा कि उनके मुवक्किल इस मामले में पक्षकार हैं। इसके बाद अदालत ने कहा कि पहले मुख्य मामले में हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर दावों पर सुनवाई की जाएगी और उसके बाद ही आवेदनों, हस्तक्षेप समेत अन्य पर अदालत गौर करेगी। गौरतलब है कि शिया बोर्ड ने हलफनामे में कहा है कि जन्मभूमि से उचित दूरी पर मुस्लिम क्षेत्र में मस्जिद बनाई जा सकती है। इसके अलावा 71 साल पुराने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
 
रामलला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन और यूपी सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले की जल्द सुनवाई करने पर जोर दिया, जबकि दूसरे पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अनूप जार्ज चौधरी और राजीव धवन अगले साल जनवरी से पहले इस पर सुनवाई शुरू करने के पक्ष में नहीं थे।

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