वाराणसी:आज से शुरू 250 साल पुरानी रामलीला,100 साल से लग रहीं दुकानें

Updated on: 06 December, 2019 01:19 PM

पंच लाइट और मोहताबी की रोशनी में सैकड़ों वर्ष पुरानी विश्वप्रसिद्ध रामलीला पांच सितंबर से शुरू हो रही है। सोमवार को जहां आयोजकों की तैयारी चलती रही, वहीं लीलाप्रेमी भी एक माह के लिए अपनी दिनचर्या को नए सिरे से व्यवस्थित करने में जुटे रहे। इस रामलीला को देखने के लिए काशी नरेश परिवार भी दर्शक दीर्घा में उपस्थित रहता है।

लीलाओं का आनंद उठाने, स्वरूपों में देव स्वरूपों की झलक पाने के लिए साधु संतों से सभी धर्मशालाएं भर चुकी हैं। स्थानीय मठ भी खाली नहीं हैं। जय श्रीराम के उद्घोष से शुरू होने वाली यह रामलीला एक महीने तक नगर में महोत्सव का वातावरण बनाए रखेगी। सैकड़ों वर्षों से होती आ रही रामनगर की रामलीला में धर्मानुरागियों और ज्ञानपिपासुओं का सैलाब दिखाई पड़ता है। दुनिया में हो रहे इलेक्ट्रानिक विकास से इतर यहां की रामलीला में वही उपकरण प्रयोग में लाये जाते हैं, जिनकी रोशनी में सैकड़ों वर्ष पूर्व शुरू हुई रामलीला रोशन हुई थी।

झांझ मंजीरा के साथ चौपाइयों की तान, धर्मगुरुओं की आध्यात्मिक चर्चा, भक्ति-गंगा में गोता लीलाप्रेमियों को उत्साहित करता है। लीला के दौरान अनुशासन भी गजब का। हजारों की भीड़ के बावजूद स्वानुशासन लीलाप्रेमियों की राजभक्ति दर्शाता है। पं. लक्ष्मी नारायण व्यास की एक आवाज 'चुप रहो सावधान' और पूरी भीड़ में पिन ड्राप साइलेंस हो जाना अपने आप में अद़्भुत है। रामलीला में काम कर रहे लोगों में कुछ तो तीन पीढ़ियों से लगे हैं। महंगाई के दौर में बहुत कम मेहनताना मिलने के बावजूद उनमें काम करने की ललक जरा भी कम नहीं हुई है।

सौ वर्ष पुरानी दुकान रामभजो

रामलीला के दौरान अन्य जिलों से आए लोग यहां दुकानें लगाते हैं। कुछ दुकानें तो पिछले 100 वर्षों से अधिक समय से लगाई जा रही हैं। 'रामभजो' की दुकान उनमें एक है। इस दुकान पर दुकानदार और खरीददार दोनों बदल गए परंतु दुकान आज भी परंपरागत अंदाज में सजाई जाती है।

दो वर्ग किलोमीटर में फैले एक दर्जन से अधिक लीलास्थल आज इंटरनेट से लेकर वास्तविक जिंदगी में लीलास्थल के नामों से ही पहचाने जाते हैं। सभी लीलाओं का सैकड़ों साल पुराना परम्परागत ढंग, पात्रों के मुख से निकले वही संवाद, वही लीलास्थल आज भी देश विदेश से हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते हैं। लीला के चलते कुंवर अनंतनारायण महीने भर कहीं नहीं जाते।

ये हैं कुछ खास लीलाप्रेमी

विष्णु प्रताप पिछले 20 वर्षों से रामनगर की रामलीला देखने के लिए प्रतिदिन भगवानपुर, लंका से पैदल छह किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। विष्णु का कहना है कि रामलीला देखने के बाद ह्दय को सुखद अनुभूति होती है जो बाकी कामों में नहीं मिलती।

रामजतन अदलहाट मिर्जापुर के सुरहा गांव के निवासी हैं। 68 साल की उम्र में भी रामलीला देखने आते हैं। वह पूरे एक महीने गंगा किनारे स्थित मंदिरों पर रहते हुए रामलीला देखते हैं। कहते हैं कि अब तो जिंदगी जीने का उद्देश्य ही प्रभु की लीला देखना रह गया है। यहां अनेक मठ-मंदिर हैं पर हम जैसे साधु संतों को रामनगर के कुंवर की तरफ से पूरे एक महीने का राशन दिया जाता है ।
                      
कल्लू, सरसा जमालपुर (मिर्जापुर) के निवासी हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन रामलीला को समर्पित किया है। वह पिछले 35 वर्षों से रामलीला में रामचरितमानस की पोथी के साथ ही बैठते हैं। रामलीला देखने मात्र से शरीर को सुखद अनुभूति होती है।
 

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