शिकंजा: आतंकियों को आर्थिक मदद देने पर 'ग्रे लिस्ट' में आया Pak, चीन ने छोड़ा साथ!

Updated on: 14 December, 2019 03:57 PM

आतंकवाद को फंड (वित्तीय सहायता) करने के मामले में पाकिस्तान को घेरने की भारत की कोशिशों को बड़ी सफलता मिली। शुक्रवार को फिनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान की आतंकवाद का वित्तपोषण करने के मामले में निगरानी करने के लिए उसे ‘ग्रे लिस्ट’ में डॉलने का फैसला किया है। इसके साथ ही अब पाक से होने वाली हर-एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन की निगरानी की जाएगी। हालांकि, यह निगरानी औपचारिक रूप से जून से लागू होगी।

आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक पेरिस में हुई अंतर-सरकारी निकाय एफएटीएफ की बैठक में शामिल 37 देशों में से 36 देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। जबकि एकमात्र तुर्की पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आया। पाकिस्तान को निगरानी सूची में डालने के प्रस्ताव को अमेरिका ने पेश किया था। फ्रांस, ब्रिटेन और भारत सहित तमाम इसके सह प्रस्तावक थे। हालांकि, एफएटीएफ के आधिकारिक बयान में पाकिस्तान का जिक्र नहीं है। लेकिन सूत्रों ने कहा कि पाकिस्तान को निगरानी सूची में डालने पर सहमति बन चुकी है और जून में होने वाली बैठक के बाद से अमल में आ जाएगा। पाक को इस सूची में डाले जाने के बाद देश की सभी वित्तीय लेनदेन पर इस संस्था की नजर होगी।

आखिरी समय में चीन ने हटाया अड़ंगा
मीडिया में गुरुवार को खबर आई थी कि पाकिस्तान को निगरानी सूची में डालने के प्रस्ताव का तुर्की, सऊदी अरब और चीन ने विरोध किया था। हालांकि, भारत और अमेरिका दोनों ने इन रिपोर्टों को खारिज करार दिया था। सूत्रों ने बताया कि शुक्रवार को चीन ने कई दौर की बातचीत के बाद अपनी आपत्ति वापस ले ली।
पाक पहले ही जीत का दाव कर चुका
पाकिस्तान ने बुधवार को दावा किया था कि उसे आतंकवाद को वित्तपोषित करने के मामले में निगरानी सूची में डालने का प्रस्ताव गिर गया है। पाक विदेशमंत्री ख्वाजा आसिफ ने मॉस्को यात्रा के दौरान दावा किया कि इस्लामाबाद इस प्रस्ताव को तीन महीने टालने में सफल हो चुका है।

अब भी बचने की उम्मीद
पाकिस्तान ने एफएटीएफ की सूची में डाले जाने की खबरों को कयास करार दिया है। साथ ही उसने अपनी भड़ास प्रस्ताव को पेश करने के लिए अमेरिका पर उतारी है। पाक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, हाल के महीनों में अमेरिका ने कई एकतरफा फैसले लिए हैं, जिसका असर द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ रहा है। अब भरोसा बहाल करने की जिम्मेदारी पाकिस्तान की है। इस्लामाबाद अमेरिका और ब्रिटेन की ओर से एफएटीएफ में पेश प्रस्ताव को गंभीरता से ले रहा है।

FATF की वैधता
वर्ष 1989 में अंतर सरकारी इस संस्था का गठन सदस्य देशों के मंत्रियों ने किया था और इसका न्यायाधिकार सदस्य देशों पर है। एफएटीएफ का मकसद धनशोधन, आतंकवाद को वित्तपोषण और इस तरह के अन्य खतरों से निपटने और वैश्विक वित्तीय प्रणाली को एकीकृत करने के लिए कानूनी, नियामकीय और परिचालन नियमों का लागू करना और मानक बनाना है।

फैसले के मायने
- अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और बैंकों के लिए पाकिस्तान में कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा
- पाक उद्योगपति भी अपने कारोबार का विस्तार करने के लिए वैश्विक बाजार से पूंजी नहीं उठा पाएंगे
- इस्लामाबाद पर 300 अरब डॉलर का संप्रभुता कर्ज है, ऐसे में देनदारी चुकता नहीं करने पर गिरेगी रेटिंग
- घरेलू राजनीति में भी उथल पुथल होगी, इस साल होने वाले चुनाव में सत्तारूढ़ दल की स्थिति और कमजोर होगी

पाक की पहले भी हो चुकी निगरानी
एफएटीएफ की निगरानी सूची में पाकिस्तान को पहली बार शामिल नहीं किया गया है। इससे पहले भी वह 2012 से 2015 तक धनशोधन के मामले में एफएटीएफ की ग्रे सूची में शामिल किया जा चुका है।

अमेरिका बिना ग्रे सूची भी कस सकता नकेल
एफएटीएफ में पाक के खिलाफ अमेरिका ने प्रस्ताव पेश किया है। ऐसे में अगर वाशिंगटन चाहे तो एफएटीएफ की ग्रे सूची में शामिल किए बिना भी पाक के लिए आर्थिक मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित विभिन्न वैश्विक वित्तीय संस्थानों में उसका प्रभुत्व है।

View More

24x7 HELP

Visitor
अब तक देखा गया