उप-चुनाव नतीजे: सपा-बसपा गठबंधन ने ध्वस्त किया योगी आदित्यनाथ का गढ़

Updated on: 17 September, 2019 08:57 PM

जिन कारणों ने 2017 में अखिलेश सरकार की विदाई करा दी थी, लगभग उन्हीं कारणों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके अपराजेय गढ़ गोरखपुर सदर सीट पर हार का मुंह देखने को मजबूर कर दिया। 29 साल से जीत के लिए तरस रहीं सपा-बसपा और सहयोगी पार्टियां बल्लियों उछल रही हैं तो भाजपाइयों को हार पर जवाब देते नहीं बन रहा। गोरक्षपीठ के गहरे प्रभाव वाली सीट पर विपक्ष की (22 हजार वोटों से) जीत को असामान्य घटना के रूप में देखा जा रहा है। लोगों को यकीन नहीं हो रहा है कि भाजपा अपने अजेय दुर्ग में ही ढह गई। इस हार का संदेश दूर तक जाएगा।

यह फैसला गैर-भाजपा दलों का गठबंधन बनवाने में तो मददगार होगा ही, 2019 के आम चुनाव में भाजपा के खिलाफ एक ब्रह्मा का भी काम करेगा। चुनाव परिणाम बता रहा है कि महज सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ जनता में ज्यादा स्वीकार्य थे। माना जा रहा था कि मोदी सरकार के चार साल और अपने एक साल के कामकाज के बूते योगी इस चुनाव में पार्टी प्रत्याशी उपेन्द्र दत्त शुक्ल को ज्यादा बड़े अंतर से जितवाने में कामयाब होंगे। उम्मीदवारों की घोषणा होने तक भी ऐसा ही कयास लगाया जा रहा था। भाजपाई तो कोई मुकाबला मान ही नहीं रहे थे। उनका कहना था कि जीत तो सौ फीसदी से ज्यादा पक्की है। देखना यही है कि हार-जीत का अंतर उतना ही रहेगा या बढ़ेगा। बसपा के सपा को समर्थन देते ही हालात तेजी से बदलने लगे।
निषाद पार्टी, पीस पार्टी और बसपा के सहयोग से सपा दिनोंदिन मजबूत होती गई। उसके कार्यकर्ता इतने उत्साहित हो गए कि उनमें यही संदेश गया कि अगर इस बार जीत नहीं मिली तो फिर कभी भी जीत का सुख नसीब नहीं होगा। उनकी उम्मीद का सबसे बड़ा कारण यही था कि योगी उम्मीदवार नहीं थे और उनकी जगह पार्टी ने जिस उपेन्द्र शुक्ल को उम्मीदवार बनाया, योगी के मुकाबले वह कहीं नहीं ठहरते।उधर, भाजपा इस खुशफहमी में डूबी रही कि सीएम के गढ़ में हार हो ही नहीं सकती। जब योगी सांसद रहते तीन लाख से अधिक वोट से जीते थे तो अब सीएम रहते उन्हें क्या कोई हरा पाएगा।

 यूपी के मुख्यमंत्री रहे टीएन सिंह सीएम बने रहने के लिए उन्होंने गोरखपुर की मनीराम सीट से उपचुनाव लड़े। लेकिन इंदिरा कांग्रेस के प्रत्याशी रामकृष्ण द्विवेदी ने उन्हें करारी मात दे दी। उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी। ’ बरसों बाद गोरखपुर मेयर का चुनाव हुआ। उस वक्त बतौर निर्दलीय खड़ी हुईं किन्नर आशा देवी को जनता ने मेयर के लिए भारी मतों से जिता दिया।’ अब गोरखपुर की जनता ने बरसों बाद गोरखपुर की सांसदी भाजपा को न देकर सपा को जिस तरह सौंप दी, वह अब चौंकाने वाली ही मानी जा रही है।
1989 से 2018 तक गोरक्षा पीठ के महंत रहे यहां से सांसद ’ 1989 में महंत अवैद्यनाथ हंिदूू महासभा की टिकट पर लोकसभा पहुंचे थे ’ 1998 से महंत अवैद्यनाथ के शिष्य योगी आदित्यनाथ यहां से जीतते आ रहे थे।

मतदाताओं ने 14 वर्ष पहले (2004 के संसदीय चुनाव से) अपना मिजाज बदला था। 2004 में सपा के टिकट पर अतीक अहमद जीते थे। 2009 के चुनाव में मतदाताओं ने बसपा के कपिलमुनि करवरिया को सांसद चुन लिया था। 2014 में भाजपा के केशव प्रसाद मौर्य को चुना था।

’ 2014 में पहली बार भाजपा ने फूलपूर सीट तीन लाख के प्रचंड अंतर से यह सीट जीती ’ 2017 में फूलपुर लोकसभा सीट की पांच सीटों में से चार भाजपा के पास और एक अपना दल के पास।

’ 2018 में समाजवादी पार्टी की सदस्यता लेकर गोरखपुर सीट से लड़े चुनाव और जीते।

नागेंद्र पटेल का यह पहला चुनाव था। पटेल मतदाताओं पर अच्छी पकड़ के कारणसपा ने प्रत्याशी बनाया।

’ 1991 में इलाहाबाद डिग्री कॉलेज में उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ने के साथ ही नागेंद्र सक्रिय राजनीति में आ गए।

बसपा ने कामयाबी के साथ सपा को अपने वोट ट्रांसफर कराए हैं। हम ऐसी परिस्थितियों के लिए भी तैयारी करेंगे कि एसपी-बीएसपी और कांग्रेस साथ मिलकर लड़ सकते हैं।- केशव प्रसाद मौर्य, उपमुख्यमंत्री, यूपी

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