आरोप: मायावती सरकार में कमजोर हुआ था एससी एसटी एक्ट

Updated on: 22 April, 2019 06:28 AM

बोधिसत्व भारत रत्न बाबा साहब डा. भीमराव आंबेडकर महासभा ने बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती पर पलटवार करते हुए कहा है कि आखिर वह किस मुंह से एससी / एसटी एक्ट को फिर से समूचे स्वरूप में वापस लाए जाने की मांग उठा रही हैं? महासभा ने मंगलवार को कहा कि एससी/एसटी एक्ट को खंडित और कमजोर करने की पहल तो खुद मायावती ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में ही की थी।

महासभा के अध्यक्ष डा. लालजी प्रसाद निर्मल ने बताया कि 29 अक्टूबर 2007 को तत्कालीन बसपा सरकार के मुख्य सचिव प्रशांत कुमार की ओर से डीजी, सभी जोनल आईजी, सभी डीआईजी रेंज और सभी एसएसपी को एक शासनादेश संख्या - 1047/ छह-पुलिस-33/ 2007 जारी किया गया था।

इसमें कहा गया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जाति के सदस्यों के उत्पीड़न के मामले में त्वरित न्याय दिलाने के साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाए कि किसी निर्दोष व्यक्त को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए। यदि विवेचना में किसी मामले में यह पाया जाए कि झूठा मुकदमा बनाया गया है तो उस दशा में भारतीय दण्ड विधान की धारा 182 के तहत कार्रवाई की जाए। इस वजह से भारतीय दण्ड विधान की धारा 182 के तहत उलटे उत्पीड़न का मुकदमा लिखवाने वाले दलित पर झूठा मुकदमा लिखवाने पर कानूनी कार्रवाई होने लगी। इस तरह से तत्कालीन बसपा सरकार ने एससी/एसटी एक्ट को खुद ही कमजोर बना दिया था।

डा. निर्मल ने कहा कि तत्कालीन बसपा सरकार के इस आदेश के बाद दलितों में इस कदर निराशा फैल गई कि उत्पीड़न का शिकार होने पर भी वह पुलिस में दोषी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने से बचने लग गए क्योंकि इलाके के दबंग, पुलिस अधिकारियों से सांठगांठ करके उत्पीड़न के शिकार दलित की शिकायत को झूठा साबित करवाने में सफल होने लगे। उन्होंने कहा कि सिद्धांतत: तत्कालीन बसपा सरकार को इस एक्ट में किसी भी तरह का बदलाव करने का अधिकार ही नहीं था क्योंकि यह केन्द्रीय कानून है और संसद द्वारा बनाए गए कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली हुई है लिहाजा राज्य सरकार को इस केन्द्रीय कानून में किसी भी तरह का संशोधन करने का अधिकार ही नहीं है।

एससी / एसटी एक्ट को सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा आदेश से कमजोर होने के मौजूदा प्रकरण पर डा. निर्मल ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि केंद्र सरकार द्वारा दाखिल पुर्नविचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है, इसका स्वागत होना चाहिए। मगर  दलितों की इस लड़ाई में संसद को भी तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।

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