उपचुनाव: जातीय गणित सहेजने और असंतोष दूर करने की बड़ी चुनौती

Updated on: 19 June, 2019 07:21 PM

कैराना और नूरपूर के नतीजों ने भाजपा को बड़ा झटका दिया है। भाजपा सत्ता और संगठन की तमाम कोशिशों के बावजूद गोरखपुर और फूलपुर जैसी हार को एक बार फिर टाल नहीं सकी। नतीजों से साफ है कि भाजपा को न केवल रणनीति में व्यापक बदलाव करना होगा, बल्कि विपक्ष ने उसे उसकी ही जिस जातीय गणित के सहारे मात दी है, उसे और मजबूत करने के लिए सत्ता-संगठन से जुड़े कुछ बड़े कदम उठाने होंगे।

पार्टी में हार को लेकर मंथन शुरू हो गया है। पार्टी ने इस बार फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव से इतर रणनीति में बड़ा बदलाव किया था। जिला प्रभारी मंत्री, कई मंत्री और पदाधिकारियों को चुनाव में लगाया गया। संगठन मंत्री सुनील बंसल खुद वहां डेरा डाले रहें और कड़ी मेहनत भी हुई। इसके बावजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के 50 फीसदी मत हासिल करने के लक्ष्य को पार्टी हासिल नहीं कर सकी। विपक्ष को 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले।

जातीय गणित गड़बड़ाया :
विपक्ष भाजपा को उसकी ही जातीय गणित से मात देने में कामयाब रहा। अगर लोकसभा चुनावों को छोड़ भी दें तो विधानसभा चुनावों में भाजपा ने गैर जाटव, गैर यादव ओबीसी के साथ ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और अन्य अगड़ी जातियों के सहारे जीत हासिल की। पश्चिमी यूपी में भाजपा जाट मतों को हासिल करने में कामयाब हुई थी। साथ ही छोटे दलों जैसे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी व अपना दल सोनेलाल से सटीक गठबंधन किया।

कहना गलत नहीं होगा कि फूलपुर-गोरखपुर में विपक्ष ने कुछ ऐसा ही गठजोड़ किया। गोरखपुर में निषाद पार्टी के ही नेता को सपा का टिकट दिया, वहीं फूलपुर में भाजपा के पटेल प्रत्याशी के सामने पटेल को उतार कर भाजपा के वोटों में सेंध लगाई। विपक्ष ने भाजपा की इसी रणनीति की काट के रूप में जाट वोटों के बंटवारे के लिए रालोद को आगे किया। रालोद के बैनर तले मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में उतारा गया, जो मूलत: सपा की नेता थीं, यानी कमोबेश गोरखपुर जैसी रणनीति अपनाई गई। जहां गोरखपुर में निषाद वोटों के बंटवारे से भाजपा की हार हुई थी, वहीं कैराना में जाट वोटों के बंटवारे से हार हुई है। वोटों के अंतर को देखें तो भी यह साफ नजर आता है।

मतदाताओं की उदासीनता रही वजह :
भाजपा का वोटर कही जाने वाली जातियों में मतदान के प्रति वह उत्साह नहीं दिखा। जिसके चलते वोट प्रतिशत दोनों उपचुनावों में कम रहा। ध्यान देना होगा कि उनके वोटर क्यों उदासीन है। मसलन, पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतोष के साथ ही थाने से लेकर तहसील तक फैल रहे असंतोष को दुरुस्त करना होगा।

गन्ना भी रहा एक मुद्दा :
गन्ना किसानों का मुद्दा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी के एक बड़े जाट नेता और क्षत्रिय नेता में सामंजस्य की भी बातें उठ रही हैं। कहा जा रहा है कि गन्ना बकाए का करीब 900 करोड़ रुपये कैराना और आसपास के इलाके में बकाया है। इसे लेकर भी नाराज़गी रही। रालोद से भाजपा में आए विधायक सहेंद्र सिंह रमाला ने पार्टी के दो बड़े नेताओं के अलावा सत्ताशीर्ष पर मिलकर यह बात बताई लेकिन नतीजा सिफर रहा।

सत्ता-संगठन पर पड़ेगा असर :
इस चुनाव परिणाम का असर आने वाले दिनों में भाजपा के सत्ता व संगठन में दिखाई देगा। अगर संगठन जीत दिलाने में कामयाब नहीं रहा तो सत्ता पर काबिज मंत्रियों का भी असर नहीं दिखा। एक असंतोष ओबीसी और दलितों की सरकार में भागीदारी को लेकर है। सरकार के ओबीसी और दलित नेता-सांसद खुद सरकार पर हमले बोलते रहे हैं। ऐसे में पार्टी अब मंत्रिमंडल विस्तार के साथ ही संगठन में बड़े पदों पर बदलाव करे तो हैरत नहीं।

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