दारुल उलूम का फतवा, औरतों का मर्दों के साथ बारात में जाना नाजायज

Updated on: 21 April, 2019 04:24 PM
हाल ही में विवाह समारोह में पुरुषों और महिलाओं के साथ-साथ खाना खाने को नाजायज बताने के बाद अब दारुल उलूम ने एक अन्य फतवा जारी कर बारात में औरतों के शामिल होने को नाजायज करार दिया है। इतना ही नहीं, फतवे में नसीहत करते हुए कहा गया कि यदि महिलाएं बारात में शामिल होती हैं तो गुनाह में शामिल होंगी। देवबंद क्षेत्र के गांव फुलासी निवासी नजम गौड़ ने दारुल उलूम के फतवा विभाग दारुल इफ्ता से लिखित में सवाल किया था कि आमतौर पर घर से निकाह के लिए जब दूल्हा निकलता है तो उसे बारात कहते हैं। कई जगह बारात में ढोल-बाजे भी बजाए जाते हैं और दूल्हे को घोड़े पर बैठाकर बारात निकाली जाती है, जिसमें मर्दों के साथ-साथ परिवार और रिश्तेदारों समेत जान-पहचान की महिलाएं भी शामिल होती हैं। ऐसी बारात में गैर मर्द भी होते हैं, जिसमें महिलाओं की बेपर्दगी होती है। उनका सवाल था कि क्या इस तरह बारात ले जाने की शरीयत में इजाजत है? मुफ्ती-ए-कराम की खंडपीठ ने जारी फतवे में कहा कि बारात में ढोल-बाजे और मर्दों के साथ औरतों का बारात में जाना शरीयत-ए-इस्लाम में नाजायज है। इससे बचना वाजिब है, वरना सख्त गुनेहगार होंगे। फतवे में मुफ्ती-ए-कराम ने कहा कि अगर दुल्हन को रुखसत कराकर लाने के लिए जाना हो तो दूल्हे के साथ घर के दो या तीन लोगों का जाना ही काफी है। बारात का कोई तसव्वुर (कल्पना) ही नहीं : कासमी दारुल इल्म के मोहतमिम मुफ्ती आरिफ कासमी ने कहा कि शरीयत-ए-मोहम्मदिया में बारात का कोई तसव्वुर (कल्पना) ही नहीं है। उन्होंने शरीयत के हवाले से बताया कि बारात में काफी तादाद (संख्या) में औरतों-मर्दों को ले जाने की कोई नजीर मोहम्मद साहब की जिंदगी से नहीं मिलती है। जो लोग इस तरह से बारातों को ले जा रहे हैं, वह शरीयत-ए-इस्लाम की तरह नहीं, बल्कि दूसरे मजहब के लोगों से प्रभावित हैं।
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