एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा रिव्यु : नए जमाने की अनोखी लव स्टोरी

Updated on: 20 February, 2019 11:59 PM
फिल्म: एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा निर्देशक: शैली चोपड़ा धर कलाकार: अनिल कपूर, राजकुमार राव, सोनम कपूर, जुही चावला, बृजेंद्र काला, सीमा पाहवा ढाई स्टार (2.5 स्टार) आज से 25 साल पहले रिलीज हुई ‘1942 ए लव स्टोरी’ में ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ गाना अनिल कपूर ने मनीषा कोइराला के लिए गाया था। ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में वो गाना सोनम कपूर अपनी प्रेमिका रेजिना कसांद्रा के लिए गाती हैं। गाने के संदर्भ में यह परिवर्तन इन 25 सालों में हमारे समाज और सिनेमा के बदलाव का भी थोड़ा-बहुत संकेत देता है। हालांकि कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो समलैंगिकता को अभी भी समाज और सिनेमा दोनों में स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन अब अपराध भी नहीं है। पहले इस पर बात करना भी उचित नहीं समझा जाता था, लेकिन अब इस पर बात हो रही है। और बात निकली है, तो शायद दूर तलक पहुंचे। अब बात कहानी की... मोगा, पंजाब के मुकेश अंबानी यानी चौधरी बलविंदर सिंह (अनिल कपूर) का गारमेंट का कारोबार है। वह एक शादी में दिल्ली में आते हैं, जहां उनकी बेटी स्वीटी की मुलाकात कुहू (रेजिना कसांद्रा) से होती है। साहिल मिर्जा (राजकुमार राव) एक नाटक लेखक है, जिसके नाटक किसी को पसंद नहीं आते। उसके पिता (कंवलजीत) एक मशहूर फिल्म निर्माता हैं। उनकी एक फिल्म भी साहिल ने लिखी थी, जो बुरी तरह फ्लॉप हुई। लेकिन साहिल प्ले लिखना नहीं छोड़ता। एक दिन दिल्ली में साहिल के लिखे एक नाटक की रिहर्सल चल रही होती है। तभी अपने भाई से छुपती हुई स्वीटी वहां पहुंचती है। साहिल उसकी मदद करता है। स्वीटी उसे पसंद आ जाती है और वह उसका पता लगाने के लिए मोगा पहुंच जाता है। इस काम में उसकी मदद करती हैं छतरू जी (जूही चावला), जो हैं तो कैटरर, लेकिन उनका शौक है एक्टिंग करना। छतरू जी के साथ साहिल मोगा पहुंचता है और स्वीटी से मिलने में कामयाब भी हो जाता है, लेकिन तभी उसकी कहानी में सियापा आ जाता है। उस सियापे को ठीक करने के लिए वह एक नाटक का मंचन करने की योजना बनाता है, ताकि चीजें ठीक हो जाएं। डायरेक्शन... यह विधु विनोद चोपड़ा की बहन शैली चोपड़ा धर की पहली फिल्म है और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए एक संवेदनशील विषय को चुना है। उन्होंने इस विषय को रोचक तरीके से पेश किया है। उन्होंने लेस्बियन संबंधों के लिए थोड़ा भी भोंडापन का सहारा नहीं लिया। कोई गरमागरम सीन नहीं डाले हैं, कोई द्विअर्थी संवाद नहीं ठूंसा है, जो यह साबित करता है कि वह अपनी बात वाकई गंभीरता से कहना चाहती थीं। गजल धालीवाल का लेखन ठीक है। हालांकि पटकथा में थोड़ी सुधार की गुंजाइश थी, फिल्म के संवाद सीन के जरूरत के अनुसार हैं। उनमें चुटीलापन भी है और संजीदगी भी। हालांकि कहीं कहीं नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है, खासकर क्लाईमैक्स में, जो फिल्म को कुछ हल्का कर देता है। गीत-संगीत साधारण है। साथ ही गाने कुछ जगहों पर फिल्म के प्रवाह को बाधित भी करते हैं। कोई संजीदा बात चल रही होती है कि अचानक गाना शुरू हो जाता है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग ठीक है। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि यह बिना किसी एक्टिविज्म, बिना किसी वाद के, अपनी बात स्पष्टता के साथ दर्शकों तक पहुंचा देती है। समलैंगिकों की भावनाओं को संवेदनशील तरीके से पेश करती है, रुलाती है, हंसाती है और असर भी पैदा करती है। कई सिनेमाई कमियों के बावजूद यह फिल्म अपनी तरह से नई जमीन छूती है। एक्टिंग... फिल्म की स्टारकास्ट इसका सशक्त पक्ष है। हर कलाकार अपने किरदार में फिट नजर आता है और सबको उचित स्पेस भी मिला है। सोनम कपूर का अभिनय अच्छा है। वह काफी हद तक अपने किरदार को उभार पाने में सफल हैं। अनिल कपूर बॉलीवुड के सबसे अच्छे अभिनेताओं में से हैं। उनका अभिनय शानदार है। पिता-पुत्री के रूप में उनकी और सोनम की केमिस्ट्री फिल्म में महसूस की जा सकती है। चाहे कॉमेडी वाले दृश्य हों या भावुकता वाले, वह अभिभूत कर देते हैं। राजकुमार राव का काम कमाल का है। वह फिल्म दर फिल्म खुद को चुनौती दे रहे हैं। अपने किरदार का हर पक्ष वह इतनी सहजता से जीते हैं कि मुंह से अनायास ही वाह निकल जाता है। जूही चावला बहुत स्वीट लगती हैं। छतरू जी के किरदार के लिए जो बॉडी लैंग्वेज, जैसी संवाद अदायगी चाहिए थी, वह उनके अभिनय में दिखता है। फिल्म में उनका हर बात पर ‘माइंड शैटरिंग’ कहना ‘माइंड ब्लोइंग’ लगता है। बृजेंद्र काला और सीमा पाहवा के किरदार मजेदार हैं और दोनों फिल्म में कुछ हल्के-फुल्के क्षण लेकर आते हैं। स्वीटी के भाई बबलू के रूप में अभिषेक दुहान का अभिनय अच्छा है। उन्होंने एक भाई की स्वाभाविक दुविधा, गुस्से को स्वाभाविक तरीके से पेश किया है। देखें या न देखें... हो सकता है कि यह फिल्म समलैंगिता को नापसंद करने वाले, स्वीकार नहीं कर पाने वाले बहुसंख्यक लोगों को अपने पक्ष में न खड़ा कर सके, लेकिन उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, ‘न्यूट्रल’ तो करती है। साल की शुरुआत में इस तरह की फिल्म का आना यह भी जताता है कि नई पीढ़ी धीरे ही सही, बदलावों के लिए अपने को तैयार कर रही है।
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