1971 युद्ध और राजनीति: तब एकजुट अब क्यों नहीं

Updated on: 12 November, 2019 05:05 AM
जब देश का सवाल हो, तब पूरे देश ही नहीं, देश की पूरी राजनीति को भी एकजुट हो जाना चाहिए। वर्ष 1971 में जब पाकिस्तान के साथ युद्ध की नौबत आई, तब देश की पूरी राजनीति एकजुट हो गई थी। पूरा विपक्ष तब सत्ता पक्ष के साथ खड़ा हो गया था। आज उस दौर की याद इसलिए भी आ रही है, क्योंकि आज कहीं न कहीं विपक्ष में नाराजगी और असहमति है। आज सरकार को विपक्ष का वैसा समर्थन नहीं मिल रहा है, जैसा 1971 में मिला था। सृष्टि चौधरी और आकांक्षा आहूजा की रिपोर्ट:- जब 48 साल पहले भारत और पाकिस्तान के बीच संपूर्ण युद्ध छिड़ गया था, तब देश की विपक्षी पार्टियां तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पीछे एकजुट खड़ी हो गई थीं। वर्ष 1971 में लोकसभा सदस्यों ने दलगत सीमाओं से पार जाकर मेजें थपथपाकर और कागजों को हवा में उछालते हुए जय बांग्ला, जय इंंदिरा गांधी का नारा लगाया था, दिसंबर 1971 में जब पाकिस्तान ने बिना शर्त समर्पण कर दिया, तब लोकसभा में सदस्यों ने खड़े होकर इंदिरा गांधी का अभिवादन किया था। गौरतलब है कि इस घटना से मात्र आठ महीने पहले आम चुनावों में संयुक्त विपक्ष को इंदिरा गांधी ने हराया था। विपक्षी पार्टियों द्वारा मिले इस समर्थन से अभिभूत इंदिरा गांधी ने सर्वदलीय बैठक को संबोधित करते हुए कहा था, मुश्किल समय में समर्थन के लिए सभी पार्टियों के प्रति मैं आभार जताती हूं। 18 दिसंबर 1971 को हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित एक पुरालेख रिपोर्ट में दर्ज है, भाकपा, द्रमुक और जनसंघ के पितांबर दास और कांग्रेस (ओ) के मोरारजी देसाई, जो तब कांग्रेस से अलग हो चुके थे, के बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रशंसा करने की मानो होड़ सी मच गई थी। तमाम विपक्षी नेताओं में केवल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता ही इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत प्रशंसा से बच रहे थे। उस दौर की खबरें यह भी रेखांकित करती हैं कि भारतीय वायु पट्टियों पर हमले को राष्ट्रीय आपात स्थिति मानते हुए भी विपक्ष एकजुट हो गया था। भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती संस्करण जनसंघ के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था, दुश्मनों के विरुद्ध पूर्ण विजय के लिए प्रधानमंत्री देश का नेतृत्व करें। यदि सरकार स्थितियों को संभालने के लिए ज्यादा शक्ति चाहती है, तो यह पार्टी पूर्ण सहयोग से नहीं हिचकेगी। . वामपंथी पार्टियों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) जैसी मुखर पार्टी, जो कांग्रेस के साथ जुड़ी भी हुई थी, और भाकपा से अलग होकर उभर रही माकपा भी सरकार के प्रति समर्थन जता चुकी थी। जवाहरलाल नेहरू की कांग्रेस से अलग होकर सी. राजगोपालाचारी द्वारा गठित स्वतंत्र पार्टी ने भी सरकार का समर्थन किया था। द्रमुक सहित दूसरी क्षेत्रीय पार्टियां भी सरकार के समर्थन में खड़ी थीं। आपात स्थिति की घोषणा 3 दिसंबर को हुई। भारत और पाकिस्तान 13 दिन तक युद्ध में लगे रहे। वर्ष 1971 में 3 दिसंबर से शुरू हुआ युद्ध 16 दिसंबर तक चला था। युद्ध का अंत पाकिस्तान की करारी हार और विश्व मानचित्र पर एक नए देश के रूप में बांग्लादेश के उदय के साथ हुआ। . भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम कराने की अमेरिकी सरकार की कोशिशों के बावजूद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बांग्लादेश के समर्थन में पूरी तरह से दृढ़ रहीं। भारतीय विपक्ष भी अमेरिका के विरुद्ध एकजुट रहा। लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी और राज्यसभा में एस.एन. मिश्रा सहित विपक्षी नेताओं ने संसद में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के भारत विरोधी बयानों की भर्त्सना की। लालकृष्ण आडवाणी, बलराज मधोक और केदार नाथ साहनी सहित अन्य जनसंघ नेताओं ने अमेरिकी उच्चायोग के बाहर प्रदर्शन तक किया था। द्रमुक, भाकपा और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अमेरिका के विरुद्ध प्रदर्शन किया था। . पुलवामा और बालाकोट के बाद पिछले सप्ताह जब पाकिस्तान के विरुद्ध कम तीव्रता का संघर्ष खत्म हुआ, तब 21 राजनीतिक दलों ने नरेंद्र मोदी की सरकार के खिलाफ एक बयान जारी कर दिया, जिसमें सैन्य बलों की शहादत के जबर्दस्त राजनीतिकरण का आरोप था और जिसमें कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को संकीर्ण राजनीतिक सोच से परे रखा जाए। मीडिया स्टडीज सेंटर के अध्यक्ष एन भास्कर राव कहते हैं, राजनीतिक पार्टियों के बीच विमर्श में गिरावट आई है। यह उल्लेखनीय है कि वर्तमान संघर्ष से अलग वर्ष 1971 में स्पष्ट युद्ध की स्थिति थी। और आज कुछ दूसरे महत्वपूर्ण कारक भी हैं, जिसमें आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई और मीडिया का हावी नैरेटिव भी शामिल है। . एक दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 1971 में विधानसभा चुनावों को टालने का मुद्दा सामने आया, तब जनसंघ के नेता अटल विहारी वाजपेयी और स्वतंत्र पार्टी के नेता पी.के. राव ने पूरी मजबूती से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का समर्थन किया था और यह सुनिश्चित किया था कि विस्तार एक वर्ष के लिए होना चाहिए। हालांकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता तीन महीने में चुनाव चाहते थे। खैर, विपक्ष ने तभी अपनी असहमति का इजहार किया, जब युद्ध विराम की घोषणा हो गई। विपक्ष ने युद्ध विराम की सरकार की घोषणा से अलग अपना मत रखा था। असहमति का प्रमुख स्वर जनसंघ के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से आया था, उन्होंने कहा, वह एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा से पूर्ण रूप से सहमत नहीं हैं और इस विषय पर संसद में चर्चा चाहते हैं। वाजपेयी ने अपने जोशीले भाषण में कहा था, हमारे जवानों ने युद्ध भूमि में जो जीता है, उसे यह देश वार्ता के टेबल पर हारने को तैयार नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार से कहा था, हम पश्चिमी मोर्चे पर यथास्थिति कायम रखने की मंजूरी नहीं देंगे, यह युद्ध पाकिस्तान की उस आक्रामकता का हमेशा के लिए इलाज करे, जो हर पांच वर्ष पर फूटती रहती है। संसद में इंदिरा गांधी एकता की भावना का हम अभिनंदन करते हैं, जिसने विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच के सभी भेद-भावों को मिटा दिया। हम उस भातृ-भावना का भी अभिनंदन करते हैं, जिसने हमारी जनता के सभी वर्गों के बीच एक नई एकता पैदा की है। मेरे विचार में इन सभी गुणों का अभिनंदन करने के लिए आज हमलोग यहां एकत्रित हुए हैं। इस संकट की घड़ी में यदि कोई भी एक गुट अलग होता, तो हम सफलता प्राप्त नहीं कर सकते थे। युद्ध की वजह क्या थी? पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में पश्चिमी पाकिस्तान की दमनकारी नीतियां। बांग्ला की जगह उर्दू थोपने की कोशिश। बांग्ला नेताओं का राजनीतिक दमन। पाकिस्तानी सेना ने खूब अत्याचार किए, पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे। . युद्ध कैसे शुरू हुआ? भारत सतर्क था, लेकिन मूकदर्शक बना हुआ था। पाकिस्तान की ओर से ही आक्रामकता शुरू हुई। पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत के करीब 11 वायु स्टेशन पर हमला बोल दिया। इसके बाद भारत बांग्लादेश की मुक्ति के लिए युद्ध मैदान में उतर आया। . युद्ध कैसे खत्म हुआ?. पाकिस्तान को भारत ने मुंहतोड़ जवाब दिया। पश्चिमी मोर्चे पर भी भारत ने 15,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा जमीन जीत ली। पूर्वी मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना बुरी तरह से परास्त हुई। उनकी सेना ने भारतीय सेना के सामने समर्पण कर जान बचाने में बेहतरी समझी। . भारत ने क्या किया? भारत ने पाकिस्तान के साथ 2 जुलाई, 1972 को शिमला समझौता किया। पश्चिमी मोर्चे पर जीती जमीन लौटा दी। पाकिस्तानी युद्धबंदियों को छोड़ दिया। बांग्लादेश को पाकिस्तान के चंगुल से आजाद करा दिया और उसकी जमीन से भारतीय सेना वापस लौट आई। . पाकिस्तान ने क्या किया? पाकिस्तान ने शिमला समझौता और भारत की भलमनसाहत को भुला दिया। सेना ने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करके अपनी हार और झेंप को मिटाने का प्रयास किया। पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता बढ़ी। भारत के खिलाफ आतंकवाद की नीति बनाई।. - 37 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए थे। . - 12 हजार से ज्यादा लोग युद्ध में दोनों तरफ मारे गए।. - 15 हजार वर्ग किमी. से ज्यादा जमीन भारत ने जीती थी. - 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदी बनाए गए. - 13 दिन चला था बांगलादेश की मुक्ति के लिए युद्ध.
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