यज्ञ वेदिका है होलिका, इसमें मत डालिए कूड़ा कचरा, इतिहास और परंपराएं भी जानिए

Updated on: 17 October, 2019 02:18 PM
आप जब अपने घरों में हवन करते हैं तो क्या उसमें कूड़े-कचरे की आहुति देते हैं? नहीं न...! फिर होलिका दहन के लिए शहर के चौराहे-चौराहे पर कूड़ा करकट और प्लास्टिक क्यों जुटा रहे हैं। आप को पता होना चाहिए कि होलिका में जलने वाली अग्नि यज्ञ वेदिका में जलने वाली अग्नि की ही प्रतीक है। परंपरा के अनुसार वसंत पचंमी को शहर में सभी प्रमुख स्थानों पर होलिका के रूप में हरे पेड़ की शाखा काट कर लगा दी गई। कुछ नहीं मिला तो पुरानी दौरी-सूप के साथ पुराना प्लास्टिक रखकर होलिका के लिए जगह घेर ली। अब भी वक्त है, आप अपने मोहल्ले में पवित्रता, स्वच्छता के साथ होलिका जलाने की पहल कर सकते हैं। पं. विष्णुपति त्रिपाठी के अनुसार वैदिक युग में होलिका के लिए गूलर के पेड़ की शाखा वसंत पंचमी पर गाड़ी जाती थी। उसे विभिन्न रंगों वाली पताकाओं से सजाया जाता था। गूलर की शाखा पवित्रता के साथ मधुरता की भी प्रतीक है। होलिका के समीप जुटने वाले वैदिक पहले अपने-अपने वेद की ऋचाओं का गान करते थे। फिर वेदों का समवेत गान करते हुए होलिका दहन करते थे। शंकर और प्रह्लाद से जुड़ी है कथा फाल्गुनी पूर्णिमा को होली पर्व मनाने की शुरुआत वैदिक सोमयज्ञ के अनुष्ठान से शुरू हुई। आगे चल कर भगवान शंकर, भक्त प्रह्लाद और उसकी बुआ होलिका के आख्यान से जुड़ गए। शिवमहापुराण के अनुसार इस पर्व का संबंध ‘काम दहन’ से है। भगवान शंकर ने अपनी कोध्राग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था। तभी से इस त्योहार का प्रचलन हुआ। होलिकोत्सव की एक शाखा भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकशिपु और उसकी बहन होलिका से जुड़ी है। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के लिए होलिका से कहा कि उसे गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए। अग्नि में होलिका जल गई मगर प्रह्लाद बच गए। तब से होली का उत्सव जन सामान्य में उत्कर्ष तक पहुंचा। आम की मंजरी खाने का महत्व होली के दिन आम की मंजरी और चंदन मिला कर खाने का बड़ा महत्व है। ऐसा करने से कई मौसमी विकारों से बचा जा सकता है। कहते हैं, जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा को एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते श्रीगोविंद के स्वरूप के दर्शन करते हैं उन्हें वैकुंठ वास का अधिकार मिलता है।
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