काशी विश्वनाथ दरबार में रंगभरी एकादशी...गुलाल की धुंध, डमरू की गर्जना के बीच गुजरी गौरीशंकर की पालकी

Updated on: 06 December, 2019 06:13 AM
रंगभरी एकादशी पर रविवार को काशीवासियों ने बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेली। ब्रह्म मुहूर्त में बाबा की रजत प्रतिमा के पूजन आरती के बाद रंगभरी के रंगारंग उत्सव का श्रीगणेश हो गया। राजसी ठाट में देवी पार्वती और श्रीगणेश के साथ साढ़े तीन सौ वर्ष पुरानी पालकी पर प्रतिष्ठित करके बाबा की चल प्रतिमा काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में ले जाई गई। बमुश्किल 21 कदम की पालकी यात्रा के दौरान इतना गुलाल और अबीर उड़ाया गया कि पूर्व महंत आवास से मंदिर प्रांगण तक जमीन पर दो इंच से मोटी अबीर की परत बिछ गई थी। पूर्व महंत आवास के आंगन में बिछाई गई हरी कालीन पहले गुलाल की बौछार से लाल हुई फिर भभूत से सफेद हो गई। इससे पहले पूर्व महंत डॉ. कुलपति तिवारी और उनके परिवार के सदस्यों ने बाबा की विधानपूर्वक आरती उतारी। खादी का शाही कुर्ता-धोती धारण किए बाबा के मस्तक पर बनारस की गंगा जमुनी तहजीब रेशमी पगड़ी के रूप में इठला रही थी। बनारसी साड़ी और आभूषणों में सजी देवी पार्वती को पूर्व महंत परिवार के सदस्यों ने मिलजुल कर सजाया। शृंगार और भोग आरती के बाद बाबा का शृंगार दर्शन भक्तों के लिए खोला गया। जैसे-जैसे सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे भक्तों का उत्साह कैलाश पर्वत सी ऊंचाई प्राप्त कर रहा था। दर्शन पूजन का क्रम शाम 5 बजे तक जारी रहा। ऐसी भी स्थिति आई जब एक तरफ बाबा की रजत पालकी उठाने की तैयारी हो रही थी और दूसरी ओर भक्तों का रेला बाबा के दर्शन के लिए पूर्व महंत आवास में प्रवेश करने की जद्दोजहद कर रहा था। अत्यधिक भीड़ के कारण भक्तों को अनुरोध पूर्वक रोकना पड़ा। नगर के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले डमरू दल के सदस्यों ने थोड़ी-थोड़ी देर पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। एक समय ऐसा भी आया जब डमरूवादकों का जोश व्यवस्था पर भारी पड़ता दिखा। ऐसे में कुछ समय के लिए शिवांजलि कार्यक्रम को रोकना भी पड़ा। राजशाही स्वरूप में शिवशंकर के दर्शन पाने के लिए हजारों भक्त पहुंचे। सांगीतिक अनुष्ठान के दौरान चंदन का बुरादा और फूलों से बनी अबीर की वर्षा भी रह-रह कर होती रही। भक्तों की हर्ष ध्वनि के बीच शिव-पार्वती की चल रजत प्रतिमा काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित की गयी और गुलाल की बौछार के बीच सप्तऋषि आरती हुई। भक्तों ने किया मुख डमरू का भी वादन काशी में लुप्त होती मुखडमरू वादन की परंपरा एक बार पुन: रंगभरी एकादशी के दिन जीवंत हो उठी। काशी की परंपरा के अनुसार हरहर महादेव के घोष के बाद मुखडमरू का वादन किया जाता था। शिवांजलि कार्यक्रम के दौरान भक्तों ने आधा दर्जन से अधिक बार मुखडमरू वादन कर बाबा के प्रति अपनी निष्ठा निवेदित की।
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