अमेठी-रायबरेली में कांग्रेस आश्वस्त, बीजेपी ने भी लगाया दमखम

Updated on: 25 August, 2019 01:16 PM
उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली की वीवीआईपी लोकसभा सीटें लंबे समय से कांग्रेस की गढ़ रही हैं। इस बार के चुनाव में भी पार्टी यहां से बड़ी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। दूसरी ओर भाजपा इस दफा कांग्रेस के इस गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश में जुटी है। खासकर अमेठी सीट पर कांग्रेस को चुनौती पेश करने के लिए भाजपा ऐड़ी चोटी का जोर लगा रही है। अमेठी और रायबरेली लोकसभा सीटों से नेहरू-गांधी परिवार का कोई न कोई सदस्य प्रतिनिधित्व करता रहा है। इंदिरा गांधी, संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी को यहां की जनता ने अपना प्रतिनिधि चुना है। मगर, भाजपा इस बार अमेठी का किला कांग्रेस से छीनने के लिए खासी मशक्कत कर रही है। अमेठी से राहुल गांधी और रायबरेली से सोनिया गांधी अपना नामांकन पत्र भर चुके हैं। जबकि केंद्रीय मंत्री व भाजपा की प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने गुरुवार को अमेठी से नामांकन किया। राहुल गांधी इस बार अमेठी के अलावा केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं। अब देशभर की निगाहें रायबरेली और अमेठी के साथ-साथ वायनाड पर लगीं हैं। अमेठी में पिछली बार भाजपा की स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को चुनौती दी थी। इस चुनाव में राहुल गांधी भारी मतों से जीते थे, हालांकि उनकी जीत का अंतर घट गया था। इस बात ने भाजपा को उत्साहित कर रखा है। स्मृति ईरानी के नामांकन के वक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पहुंचे और रोड शो किया। आने वाले दिनों में भाजपा के और भी दिग्गज यहां आकर प्रचार करेंगे। वैसे भाजपा अमेठी सीट एक बार जीत भी चुकी है। हालांकि तब यहां से नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में नहीं था। कांग्रेस भी अपने इन किलों में बड़ी जीत दर्ज कराने की परंपरा कायम रखने के लिए खासी मशक्कत कर रही है। नामांकन के दौरान गांधी परिवार के सभी सदस्यों की मौजूदगी बताती है कि पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। सपा-बसपा गठबंधन ने ये दोनों सीटें कांग्रेस के समर्थन में छोड़ दी हैं। इस कारण कांग्रेस के पक्ष में स्थिति और बेहतर व मजबूत नजर आ रही है। वैसे अमेठी व रायबरेली की जनता का नेहरू-गांधी परिवार से भावनात्मक लगाव रहा है। यही लगाव यहां से संजय गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी को जिताता रहा है। राहुल गांधी अमेठी से लगातार तीन बार सांसद चुने गए हैं। इस कारण विरोधी दलों के लिए यहां अपनी जमीन तैयार कर पाना टेढ़ी खीर रहा है।
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