जानें, आप कैसे हो जाते हैं ग्रेच्युटी के हकदार और कैसे होती है गणना

Updated on: 22 April, 2019 02:30 AM
निजी क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मियों को रिटायरमेंट या पांच साल बाद नौकरी छोड़ने पर मिलने वाली एकमुश्त रकम ग्रेच्युटी के तौर पर मिलती है। इसके लिए नौकरी छोड़ने के आखिरी माह के वेतन के आधार पर गणना करनी होती है। नौकरी छोड़ने की स्थिति में कुछ शर्तों को पालन करने के बाद ही ग्रेच्युटी की रकम मिलती है। ग्रेच्युटी में मिलने वाली रकम दो बातों पर निर्भर करती है। इसमें पहला होता है कर्मचारी को अंतिम मिलने वाला वेतन और दूसरा उसके द्वारा उस कंपनी में काम की अवधि। यहां मूल वेतन का मतलब बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ता (डीए) है। सैलरी के दूसरे भत्ते को इसमें शामिल नहीं किया जाता है। कर छूट की सीमा भी बढ़ी हाल ही में सरकार ने ग्रेच्युटी की रकम पर मिलने वाली आयकर छूट की सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख कर दिया है। अगर आप निजी क्षेत्र के पेशेवर हैं और ग्रेच्युटी में मिलने वाली रकम की गणना को लेकर ऊहापोह की स्थिति में हैं तो आप आसानी से अपने काम के साल और वेतन के जरिये मिलने वाली ग्रेच्युटी की गणना कर सकते हैं। क्या कहता है कानून? पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी ऐक्ट, 1972 के मुताबिक, अगर किसी कंपनी में 10 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं तो उसे अपने कर्मचारियों को ग्रेच्युटी देना होगा। वैसे जो कंपनियां इस कानून के दायरे में नहीं आती हैं, वे भी चाहें तो अपने कर्मचारी को ग्रेच्युटी दे सकती हैं। उदाहरण से इस तरह समझें मूल वेतन व महंगाई भत्ता : 50,000 सेवा काल : 12 वर्ष वेतन को 26 से भाग करें = 50000/26 = 1923 एक साल की ग्रेच्युटी के लिए 15 से गुणा करें= 1923x15 = 28,845 12 साल की ग्रेच्युटी = 28845x12 = 3,46,140 आयकर छूट की सीमा बढ़ी आयकर की धारा, 1961 के तहत 20 लाख रुपये तक की ग्रेच्युटी की रकम को कोई कर नहीं देना होता है। पहले यह सीमा 10 लाख रुपये की थी। संशोधन के बाद सरकार ने ग्रेच्युटी की बढ़ी हुई सीमा के दायरे में सभी सरकारी कर्मचारियों, पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी ऐक्ट के दायरे में आने वाले कर्मचारियों के साथ-साथ इस ऐक्ट के दायरे में नहीं आने वाले कर्मचारी को भी शामिल किया है। समयसीमा घटाने की मांग देश भर में निजी क्षेत्रों में काम कर रहे कर्मचारियों को राहत देने के लिए कर्मचारी यूनियनों की ओर से ग्रेच्युटी की समय सीमा को पांच साल से घटाकर तीन साल करने की मांग हो रही है। कर्मचारी संगठनों को उम्मीद है कि इस साल के अंत तक सरकार की तरफ से यह पहल की जा सकती है।
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