कश्मीर में शहीद मेजर को अंतिम विदाई देने उमड़ा जनसैलाब

Updated on: 17 October, 2019 07:10 AM
जम्मू-कश्मीर में कुपवाड़ा के माछिल सेक्टर में आतंकियों के सर्च आपरेशन के दौरान शहीद मेजर विकास सिंह को अंतिम विदाई देने जनसैलाब उमड़ पड़ा। शहादत पर हजारों आंखें नम थीं। सैकड़ों लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम यात्रा में विदा किया। अंतिम दर्शन को उनके पैतृक गांव ताड़ीघाट में सुबह से ही लोगों की भीड़ जुटी रही। प्रशासन और सरकार से जुड़े लोगों ने परिवार को ढांढ़स बंधाया और सरकार की ओर से हर संभव मदद का आश्वासन दिया। गाजीपुर से पहले शहीद के पार्थिव शरीर को विमान से वाराणसी के बाबतपुर एयरपोर्ट लाया गया। जहां अधिकारियों अौर अन्य लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। सेना के वाहनों के साथ सोमवार की देर रात मेजर विकास सिंह का पार्थिव शरीर गांव में लाया गया। अंतिम दर्शन के लिए गांव के बाहर पंडाल में पार्थिव शरीर रखा गया। पार्थिव शरीर पहुंचते ही कोहराम मच गया। मां और पत्नी दहाड़ मारकर रोने लगी। परिवार के अन्य लोगों ने किसी तरह उन्हें समझाया। उनके दरवाजे सुबह से लेकर रात भर लोगों की भीड़ जुटी रही। तिरंगे में लिपटे शहीद के पार्थिव शरीर की अंतिम यात्रा शुरू करने से पहले गारद ने अपने मेजर को सशस्त्र सलामी दी। आगे-आगे साथी का पार्थिव शरीर लेकर जवान चले तो पीछे-पीछे बड़ी संख्या में लोग पैदल चलते रहे। गाजीपुर घाट पर अंतिम संस्कार के समय डीएम के.बालाजी, एसपी डा. अरविंद चतुर्वेदी, समेत तमाम लोग मौजूद रहे। शहादत पर नमन को पूर्व मंत्री समेत पहुंचे डीएम व एसपीभी पहुंचे। पूर्व मंत्री समेत पहुंचे एसपी-डीएम शहीद के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन के लिए सुबह से उनके घर पर लोगों का जमावड़ा लगा रहा। पूर्व कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश सिंह, डीएम के. बालाजी और एसपी अरविंद चतुर्वेदी समेत जिला प्रशासन के अन्य अधिकारियों ने श्रद्धांजलि दी। आंतकियों को नेस्तनाबूत करने को चुना था श्रीनगर जोश और पराक्रम से लबरेज मेजर विकास सिंह ने आतंकियों का सफाया करने को श्रीनगर चुना था। हर कदम जोखिम भरा और दहशतगर्दों का गढ़ मगर, निर्भीक मेजर विकास के हौंसले चट्टान से भी ज्यादा मजबूत थे। आतंक की परवाह किए बिना वह वीर भारत मां की सेवा को पहुंच चुका था। सर्च आपरेशन में आतंकियों को पकड़ने की कवायद ही थी कि मेजर दुर्घटना का शिकार हो गए। हादसे में चोटें ज्यादा लगने से वीर सपूत शहीद हो गया। मेजर की उनकी इस शहादत पर पूरा गाजीपुर गमजदां नजर आया। गांव में सुबह से जुटे लोग उनकी वीरता और पराक्रम की बात करते नहीं थकते। ताड़ी घाट निवासी मेजर विकास सिंह ने अपनी नौकरी के दौरान सबसे पहले श्रीनगर को चुना। परिजनों की माने तो वे कहते थे कि एक बार उन्हें बॉर्डर पर जाना है। भारत माता की सेवा करनी है साथ ही दुश्मन से दो-दो हाथ करने हैं। पहले भी उन्हेांने कई बार दुश्मन का सीना छलनी करते हुए उन्हें खदेड़ा था। नए घर में गृह प्रवेश का सपना रह गया अधूरा पिता की हत्या के बाद विकास परिवार को पूरी तरह सुरक्षित करना चाहते थे। इसके चलते नौकरी से पूंजी जमा कर और परिजनों की मदद से वाराणसी में मकान खरीदा। पत्नी को भी गांव का माहौल रास नहीं आता था इसलिए सुरक्षित भविष्य की आस रखी। बेटी वृद्धि के दुनिया में आने के बाद विकास ने कई सपने देखे, उसमें से नया घर भी था। लेकिन इस घर में गृह प्रवेश का उनका सपना अधूरा ही रह गया। वाराणसी में रहती पत्नी और गांव में मां ताड़ीघाट गांव निवासी मेजर विकास सिंह 55 राजपूताना राइफल्स में तैनात थे। उनकी पत्नी आंचल सिंह वाराणसी में बेटी वृद्धि के साथ रहती हैं और उनकी मां, चाचा गांव में रहते हैं। असुरक्षा के चलते उन्हें गांव का माहौल रास नहीं आता था। वह लगातार मां से बनारस में ही रहने की जिद करते थे।
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