तमाम शरारतें और भरपूर पिटाई

Updated on: 22 October, 2019 03:03 PM
बचपन में मैं बहुत शरारती था। आए दिन ऐसा होता था कि घर में हमारा इंतजार हो रहा है और हम बाहर कभी पिट्ठू खेल रहे होते थे, तो कभी गुल्ली-डंडा। एक बार हम लोग पिट्ठू खेल रहे थे, कैनवस की बॉल थी। मैंने एक लड़के को मारा और उसके कान में चोट लग गई। खून निकलने लगा, क्योंकि कान के कोने का एक हिस्सा कट गया था। उस रोज मुझे बहुत डांट पड़ी थी। इसी तरह, हम लोग कई बार जामुन तोड़ने के लिए निकल जाते थे। हमारे घर के पास बिजली पहलवान की एक जगह थी। वहां बहुत ठंडा पानी आता था। हम वहीं नहा लेते थे। वहीं कसरत करते थे। फिर वहीं वॉलीबॉल खेलने लग जाते थे। इधर घर में हमारा इंतजार होता रहता था। मन में डर भी रहता था कि शाम के छह बजने से पहले पहले घर पहुंच जाना है। यानी पिताजी के घर पहुंचने से पहले घर पहुंचना है। बहनें तो उन दिनों घर से बाहर ज्यादा नहीं जाती थीं, लेकिन हम लोग खेलते-कूदते रहते थे और कभी अगर देर हो गई, तो पिटाई तय थी। पिटाई के बाद मां फिर हमें समझाती-बुझाती थीं। वह पिताजी से भी कहती थीं कि धीरे-धीरे बच्चे समझ जाएंगे। इनकी इतनी चिंता मत किया करो। पिताजी के घर आने के बाद मेरी ड्यूटी तय थी। मैं उनके लिए बिस्तर लगाता था। रात के लिए बिस्तर के नजदीक पीने का पानी रखता था। फिर उनके पैर दबाता था। वह मेरा ‘डिपार्टमेंट’ था। आठ बजे के आस-पास वह खाना खाकर लेट जाया करते थे। फिर आधे घंटे से लेकर एक घंटे तक मैं उनके पैर दबाता था। कभी-कभी मां के पैर भी दबाता था। मैं खेलने-कूदने की वजह से थोड़ा ‘स्ट्रॉन्ग’ था, इसलिए यह काम मेरे जिम्मे था, जो मैंने कई साल तक किया। बाद में जब मैं लगातार खेलने लगा था, तब भी दो बातें तय थीं। एक, पिताजी का पैर दबाना और दूसरा, घर पहुंचने का समय। पिताजी को पता भी नहीं था कि मैं खेलने-कूदने में अच्छा हूं। वह बस यही चाहते थे कि छह बजते-बजते सारे बच्चे घर आ जाएं। कभी-कभार अगर देरी हुई, तो पिटाई भी निश्चित थी। एक बार हमारी राशन की दुकान पर बड़ी लंबी लाइन लगी हुई थी। मुझे लगता है कि कम के कम सौ-डेढ़ सौ लोगों की लाइन रही होगी। उन दिनों राशन बहुत मुश्किल से मिला करता था। मैं दुकान पर देरी से पहुंचा। राशन देने से पहले एक कार्ड पर ‘एंट्री’ करनी होती थी। यह काम कभी-कभार मेरे जिम्मे हुआ करता था, क्योंकि पिताजी को भी मदद की जरूरत पड़ती थी। मैं जब देरी से पहुंचा, तो मैंने देखा कि पिताजी अकेले सबसे जूझ रहे थे, उन्होंने जैसे ही मुझे देखा, काम तो बाद में शुरू हुआ, पहले उन्होंने मुझे ठोका। सभी के सामने उन्होंने मेरी पिटाई की। ऐसे ही एक बार मैं वॉलीबॉल खेल रहा था। तब भी पिटाई हुई थी कि यह कोई खेलने वाली ‘गेम’ है। मेरा स्कूल घर के पास ही था। स्कूल में हमारी शरारतों की शिकायत भी घर पर देर-सबेर पहुंच ही जाती थी। उसके बाद हमारी पिटाई होना बड़ी आम बात थी। इसके अलावा, जब इम्तिहान में नंबर कम आते थे, तब भी पिटाई होती थी। एक बार क्या हुआ कि मेरे हर ‘सब्जेक्ट’ में 10 से भी कम नंबर आए। किसी में दो नंबर, किसी में तीन नंबर, तो किसी में जीरो भी। रिजल्ट पर पिताजी से दस्तखत कराने थे। मैंने बदमाशी यह की थी कि जहां दो नंबर थे, उसके आगे तीन जोड़ दिया। जहां जीरो था, वहां आगे कुछ और जोड़ दिया। ऐसा करके मैं हर विषय में पास हो गया। लेकिन गलती यह हो गई कि मैं सारे नंबरों का ‘टोटल’, जो रिजल्ट के आखिरी हिस्से में एक जगह पर लिखा जाता है, करना भूल गया। मैंने वह देखा ही नहीं। जब पिताजी ने यह देखा, तो जमकर पिटाई की। खुद ही कहने लगे कि ऊपर तो सब बदल दिया, नीचे ‘टोटल’ भी तो देख लो। इसके बाद वह स्कूल पहुंच गए। वहां उन्होंने टीचरों से कहा कि सही-सही नंबर बताएं। सभी टीचरों ने मेरी शिकायत कर दी कि इसका तो पढ़ने में मन ही नहीं लगता। फिर वहां भी सबसे सामने मेरी पिटाई हुई। जब खेलने-कूदने की वजह से मैं सुबह जल्दी उठकर घर से निकलने लगा, तो मां हमेशा मुझसे पहले उठती थीं। मैं चार बजे जाऊं , चाहे साढ़े चार बजे। दूध का ग्लास उनके हाथ में होता था। पिताजी भी सुबह-सुबह मंदिर जाया करते थे। अमृतसर में ‘भाइयों का शिवाला’ नाम का एक मंदिर बड़ा मशहूर था। पिताजी रोज सुबह उस मंदिर में जाते थे। उस मंदिर में उनकी बहुत आस्था थी। वह शिव के भक्त थे और शिवरात्रि का व्रत भी रखा करते थे। बाद में तो ऐसा होता था कि वह और मैं लगभग साथ में घर से निकलते थे। वह मंदिर चले जाते थे और मैं अपनी प्रैक्टिस के लिए ग्राउंड में पहुंच जाता था। (जारी...)

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