पीएसी भर्ती घोटालाः मासूम की मौत और मोबाइल ने बड़े खेल से उठाया पर्दा

Updated on: 04 April, 2020 02:34 AM

पीएसी भर्ती घोटाले में दो सरकारी डाक्टर जेल जा चुके हैं। अभी कई सरकारी डाक्टरों, अधिकारियों और सफेदपोशों के जेल जाने का इंतजार हो रहा है। यह शायद पहला ऐसा घोटाला है जिसकी कहीं कोई शिकायत नहीं हुई। किसी कोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं हुई फिर भी एक बड़े खेल का खुलासा हो गया। अगर कहें कि प्रकृति ने खुद ऐसा खेल रचा जिसमें बड़े बड़े लोग फंसते चले गए तो गलत नहीं होगा। एक मासूम की बिल्डिंग की लिफ्ट में फंसकर हुई मौत ने अचानक सारे खेल का खुलासा कर दिया।

ऐसे खुला भ्रष्टाचार
घोटाले के खुलासे की पटकथा टकटकपुर स्थित महावीर अपार्टमेंट की बिल्डिंग के लिफ्टे से शुरू होती है। 27 अगस्त की शाम लिफ्ट में फंसकर दस साल का एक बच्चा गंभीर रूप से घायल हो जाता है। पता चलता है कि फिरोजाबाद निवासी बच्चा उसी बिल्डिंग में रहने वाले जिला अस्पताल के डाक्टर शिवेश जायसवाल के यहां काम करता था और उन्हीं के बच्चे को रोज की तरह खिलाने के लिए नीचे आया था। बच्चे को लेकर शिवेश जायसवाल उसी जिला अस्पताल में पहुंचते हैं जहां उनकी तैनाती थी। य़हां बच्चे को मृत घोषित कर दिया जाता है। जिला अस्पताल से ही पुलिस को खबर मिलती है कि लिफ्ट में फंसकर दस साल के मासूम की मौत हो गई है। इससे पहले कि पुलिस अस्पताल पहुंचती, डाक्टर शिवेश जायसवाल उसका शव लेकर गायब हो जाते हैं।

रातभऱ पुलिस शिवेश और बच्चे का शव खोजती रहती है। भोर में डाक्टर शिवेश अपने पिता कैलाश के मकबूल आलम रोड स्थित घर पर मिल जाता है लेकिन बच्चे का शव नहीं मिलता। पुलिस को बताया जाता है कि बच्चे के परिवार वालों ने शव को गंगा में बहा दिया है। पुलिस बच्चे के परिवार तक पहुंचती है। उन्हें लेकर गंगा किनारे तक जाती है लेकिन शव नहीं मिलता। डाक्टर शिवेश को बाल श्रम की धाराओं के अलावा कई अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया जाता है।

मासूम की हत्या की आशंका में पड़ताल कर रही पुलिस डाक्टर शिवेश की गिरफ्तारी के साथ उसके मोबाइल फोन को भी कब्जे में ले लेती है। यहीं से पीएसी भर्ती घोटाले के खेल का खुलासा शुरू हो जाता है। मोबाइल की पड़ताल में पता चलता है कि शिवेश उस पैनल में शामिल है जिसे अगले ही दिन पीएसी के अनफिट सिपाहियों की दोबारा मेडिकल जांच करनी है। शिवेश का मोबाइल फोन एक के बाद एक ऐसे ऐसे राज उगलने लगता है जिसे देख औऱ सुनकर पुलिस का माथा चकरा जाता है। 

पता चलता है कि अगस्त में मेडिकल पैनल का जब गठन हुआ तब एक डॉक्टर का नाम हटाकर डाक्टर शिवेश जायसवाल ने खुद अपना नाम शामिल कराया। बच्चे की मौत और गिरफ्तारी की खबर लगते ही मेडिकल से कुछ घंटे पहले ही उसे पैनल से हटा तो दिया गया लेकिन खेल जारी रहा।

पता चला कि अपर निदेशक स्वास्थ्य ने संयुक्त निदेशक की निगरानी में चार सदस्यीय पैनल का गठन किया था। इसमें डॉ. एसके पांडेय के अलावा हड्डी के डॉक्टर डॉ. संतोष झुनझुनवाला और कबीरचौरा मंडलीय अस्पताल के एक सर्जन डॉ. रवि का नाम था। डॉ. रवि का नाम हटाकर डॉ. शिवेश का नाम डाल दिया गया। कबीरचौरा मंडलीय अस्पताल के एक उच्चाधिकारी के मुताबिक इसके लिए संशोधित ई-मेल आया।

सूत्रों का कहना है कि पैनल में डॉ. शिवेश ने खुद अपना नाम जोड़वाया। 28 से 30 अगस्त मेडिकल परीक्षण होना था। उसके एक दिन पहले 27 अगस्त को डॉ. शिवेश के अपार्टमेंट की लिफ्ट में फंसने से बच्चे की मौत हुई। डॉ. शिवेश 28 की भोर में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद पैनल से डॉ. शिवेश जायसवाल का नाम हटाकर डॉ. प्रेमप्रकाश को रख दिया गया।

शिवेश का नाम जोड़ने के सवाल पर अपर निदेशक बीएन सिंह का कहना है कि सर्जन की कमी थी, इस कारण शुरुआती पैनल में डॉ. शिवेश का नाम पैनल में डाला गया। पैनल पर निगरानी के लिए संयुक्त निदेशक जीसी द्विवेदी और रामनगर पीएसी में सीओ रैंक के अधिकारी आरपी यादव भी थे।

पहले से तय हो रही थी आवेदकों से रकम
सीओ कैंट मो. मुश्ताक ने बताया कि 28 अगस्त को गिरफ्तारी के पहले ही डॉ. शिवेश व अन्य आरोपित आवेदकों के संपर्क में थे। उनके कॉल डिटेल खंगाले जाने पर इसका खुलासा हुआ है।

रिश्वत के लिए बदनाम रहा है डॉ. शिवेश
एक रामनगर, फिर कबीरचौरा और इसके बाद जिला अस्पताल में तैनाती के दौरान डॉ. शिवेश जायसवाल रिश्वत के लिए बदनाम रहा है। उस पर ऑपरेशन के नाम पर आठ से 10 हजार रुपये मांगने के कई बार आरोप लगे।

पांच साल पहले बीएचयू से पास हुआ है डॉ. पांडेय
वाराणसी। रिश्वत प्रकरण में शनिवार को गिरफ्तार डॉ. एसके पांडेय पांच साल पहले ही बीएचयू से पास आउट है। साल 2014 में बीएचयू से निकलने के बाद वह सरकारी सेवा में आया।

सामने आएंगे और बड़े नाम, पास अभ्यर्थियों की भी जांच
इस पूरे प्रकरण के पीछे एक बड़े रैकेट की बात सामने आ रही है। जांच चल रही है। इसमें बड़े लोगों के भी नाम सामने आ सकते हैं। मेडिकल बोर्ड के गठन की प्रक्रिया की भी जांच होगी। अभ्यर्थियों की भर्ती भी अब जांच के घेरे में आ गई है। इस बारे में संबंधित वाहिनियों को जल्द पत्र लिखा जाएगा।

विभागीय जांच भी होगी
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ वीबी सिंह ने बताया कि प्रकरण में जिन दो डॉक्टरों के नाम सामने आए हैं, उनमें डॉ. शिवेश जायसवाल पहले से निलंबित चल रहे हैं। वह बच्चे की मौत के प्रकरण के बाद से निलंबित हैं। सर्जन एसके पांडेय की भूमिका की भी विभागीय जांच होगी।


278 आरक्षियों का दोबारा परीक्षण हुआ
वाराणसी। पीएसी आरक्षी भर्ती में 278 अभ्यर्थियों का दोबारा स्वास्थ्य परीक्षण हुआ था। इनमें सबसे अधिक 185 आरक्षी 36वीं बटालियन पीएसी रामनगर पीएसी में भर्ती हुए। रिश्वत लेकर री-मेडिकल टेस्ट में पास कराने के आरोपितों में रामनगर पीएसी का आरक्षी रमेश सिंह भी है, जो फरार है।

प्रभारी कमांडेंट राकेश सिंह ने बताया कि पूरे प्रकरण की जानकारी देते हुए डीआईजी को पत्र लिखा गया है। वहां से निर्देश मिलने के बाद जांच होगी। दोषी पाये जाने पर रमेश सिंह के खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की जायेगी। साथ ही उन आरक्षियों की भी जांच होगी जिनकी भर्ती री-मेडिकल के जरिये हुई है। उधर भुल्लनपुर पीएसी में भी करीब 50 की संख्या में ऐसे आरक्षियों की भर्ती की बात सामने आ रही है। हालांकि वहां कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।

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