इमरान खान के शासन में हिंदू सुरक्षित नहीं, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में खुलासा

Updated on: 16 July, 2020 12:33 AM

पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति लगातार खराब हो रही है। कट्टरपंथी विचाधारा के कारण वहां हिंदू समेत अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के लोग सुरक्षित नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की एक ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ। पाकिस्तान में इमरान खान के सत्ता में आने के बाद अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के मामले बढ़े हैं। संयुक्त राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति पर आयोग (सीएसडब्ल्यू) ने पाकिस्तान: धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की। 47 पन्नों की इस रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान में इमरान खान सरकार अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा दे रही है।

अल्पसंख्यक खासकर हिंदू और ईसाई समुदाय सबसे ज्यादा खतरे में हैं। हर साल इन दोनों समुदायों की सैकड़ों महिलाओं और बेटियों को अगवा कर धर्म परिवर्तन कराया जाता है। उन्हें मुस्लिम पुरुषों से शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है। मुस्लिम युवकों से शादी होने के बाद अपहरणकर्ताओं द्वारा दी गई गंभीर धमकियों के चलते पीड़िताओं के परिवार के पास लौटने की कोई उम्मीद नहीं होती है। हिंदू लड़कियों और महिलाओं को व्यवस्थित रूप से लक्षित किया जाता है क्योंकि वे कम आर्थिक पृष्ठभूमि से आती हैं व शिक्षित हैं। सीएसडब्ल्यू ने अल्पसंख्यक बच्चों का साक्षात्कार लिया। बच्चों ने स्वीकार किया कि उन्हें शिक्षकों व सहपाठियों द्वारा अपमानित किया जाता है।

* 1000 से अधिक लड़कियों को हर साल अगवा कर जबरन धर्म परिवर्तन।
* 20 से 25 ऐसी घटनाएं प्रत्येक  महीने होती हैं जिनमें 16 वर्ष की बच्चियां शिकार हैं।

पुलिस और न्याय व्यवस्था का रवैया भी भेदभावपूर्ण
संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी इस रिपोर्ट में पाकिस्तान की पुलिस और न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। इसमें कहा गया कि पीड़ित अल्पसंख्यकों के प्रति पाकिस्तान पुलिस और देश की न्यायपालिका भी भेदभावपूर्ण रवैया अपनाते हैं। अगवा की गई अल्पसंख्यक महिलाओं के मामले में पुलिस भी कोई कार्रवाई नहीं करती है। पुलिस और न्यायपालिका अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक मानती है।

ईश निंदा कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई
सीएडब्ल्यू ने पाकिस्तान में ईशनिंदा और अहमदिया विरोधी कानून के बढ़ते राजनीतिकरण पर चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून का लोग अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ईशनिंदा कानून और उसके ऊपर बढ़ते कट्टरवाद की वजह से देश में सामाजिक सौहार्द को भारी नुकसान पहुंचा है। ईशनिंदा के संवेदनशील मामलों की वजह से धार्मिक उन्माद भड़कता है और इससे पाक में भीड़ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं।

अल्पसंख्यकों की कई दुकाने जला दी गईं
आयोग ने रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के हालात दर्शाते हुए उदाहरण दिया कि मई, 2019 में सिंध के मीरपुरखास के हिंदू पशुचिकित्सा अधिकारी रमेश कुमार मल्ही पर कुरान के पन्नों में दवाई लपेटने का आरोप लगाया गया था इसके चलते प्रदर्शनकारियों ने पशु चिकित्सा क्लिनिक और हिंदू समुदाय से संबंधित अन्य दुकानें जला दीं थीं। आयोग ने ईशनिंदा कानून का विरोध किया, जो अल्पसंख्यक को इस्लाम का अपमान करने के आरोप में अपराधी बना देता है।

पाकिस्तान सरकार ने सिर्फ कागजी प्रयास किए
पाकिस्तान सरकार ने अपने देश में चल रहे अल्पसंख्यकों के जबरन धर्म परिवर्तन पर अंकुश लगाने को नवंबर में एक संसदीय समिति गठित की। यह 22 सदस्यीय समिति कट्टर मुस्लिम बहुल देश में अल्पसंख्यकों का जबरन धर्म परिवर्तन रोकने और उनके अधिकारों का संरक्षण करने वाले एक कानून का खाका तैयार करेगी। हालांकि, अभी तक कानून  बन नहीं सका है।

आस्था के साथ अल्पसंख्यकों का जीना मुश्किल
यूएन की रिपोर्ट से पहले पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि वर्ष 2018 में यहां अपनी आस्था के मुताबिक जिदंगी गुजारने पर अल्पसंख्यकों ने उत्पीड़न का सामना किया, उन्हें गिरफ्तार किया गया। हिंदू-ईसाई महिलाओं से बलात्कार किया गया। यहां तक की कई मामले में उनकी मौत भी हुई।

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