वाराणसी के बभनियांव में खुदाई जारी, आठवीं शताब्दी की शिव-पार्वती समेत अनेक दुर्लभ मूर्तियां मिलीं

Updated on: 08 April, 2020 07:47 PM

वाराणसी के बभनियांव गांव में पुरातात्विक अवशेषों की तलाश में रविवार को भी खुदाई जारी रही। रविवार को गंगाधर शिव पार्वती की मूर्ति, महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति, बाल कार्तिकेय संग पार्वती की मूर्ति, आभा मंडल युक्त हनुमान की मूर्तियों समेत कई दुर्लभ मूर्तियां मिलीं। ये मूर्तियां आठवीं-नवीं शताब्दी की हैं। यह दावा है बीएचयू के इमेरिटस प्रोफेसर एवं इतिहास कलाविद डॉ. मारुति नंदन तिवारी का। वह रविवार को बभनियांव गांव में उत्खनन कार्य में मिली मूर्तियों का निरीक्षण करने गए थे।

बभनियांव में टीले के किनारे रखी मूर्तियां, पहले गड्ढ़े में मिले एक मुखी शिवलिंग और पास के गांव महावन में बाहर रखी मूर्तियों की जांच के बाद उन्होंने बताया कि गंगाधर शिव की मूर्ति उस कथा को दिखाती है, जिसमें भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया तो मां पार्वती नाराज हो गईं। उनको मनाने के भाव में भगवान ने अपना एक हाथ मां पार्वती के कंधे पर और दूसरा हाथ उनकी ठुड्डी पर रखा है। मां पार्वती को अपनी ओर आकृष्ट करते हुए यह भाव दर्शाता है कि लोक कल्याण के लिए शिव ने देवी गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया है।

दूसरी मूर्ति में महिषासुर मर्दिनी भगवती दुर्गा, महिषासुर को त्रिशूल से मार कर उसे पस्त कर चुकीं हैं। उनका सिंह भी आक्रमण की मुद्रा में महिषासुर का पैर जकड़े हुए है। ऐसी मुद्रा की मूर्तियां कम मिलती हैं। तीसरी मूर्ति में मां पार्वती अपने पुत्र कार्तिकेय को गोद में बैठाए हैं। हाथ में दर्पण लेकर अपने मुख को देखकर अपने सौन्दर्य के प्रति उनकी आश्वस्त मुद्रा है। चौथी मूर्ति में हनुमानजी का आभा मंडल दिख रहा है। खजुराहों के बाद यह दूसरी मूर्ति है, जो बभनियांव में मिली है। चारों मूर्तियां पाल प्रतिहार काल की हैं।

प्रतिहार काल का मंदिर होने के प्रमाण
प्रो. तिवारी बताया कि बभनियांव और महावन दोनों ही प्रतिहार काल में कला, संस्कृति एवं धर्म का महत्वपूर्ण क्षेत्र थे। इन दोनों स्थानों पर सूर्य और शक्ति के मंदिर बने, जिनकी मूर्तियां और मंदिर के चैत्य, गवाक्ष और प्रवेशद्वार के अवशेष प्रतिहार कालीन मंदिर के होने के अकाट्य प्रमाण हैं। उन्होंने मिडिया के माध्यम से मांग की कि इन स्थलों के सुरक्षित रखरखाव की व्यवस्था की जाये और पुरातात्विक पर्यटन को बढ़ावा दिया जाय।

चौथे दिन उत्खनन में पहले गड्ढ़े में प्राप्त एक मुखी शिवलिंग की पुष्टि की। उन्होनें बताया कि इस तरह की मूर्ति पंचक्रोशी मार्ग पर भैरव तालाब और रामेश्वर में भी मिली हैं। उल्लेखनीय है कि उन मूर्तियों के बारे में भी आप के अपने अखबार प्रमुखता से रिपोर्ट प्रकाशित की थी। पहले गड्ढ़े में मिले एकमुखी शिवलिंग को रविवार को छ: इंच तक और साफ किया गया तो दाढ़ी-मूंछयुत्त जटाधारी शिव का मुख स्पष्ट रूप से उभरा। बीएचयू के प्रो. ओएन सिंह ने बताया कि यह मंदिर का मध्य भाग लग रहा है। श्री दुर्गा मातृछाया शक्तिपीठ नगवा की साध्वी गीतांबरा तीर्थ अपने टीम के साथ पहुंचीं। उन्होंने कहा कि इस तरह का शिवलिंग उन्होने अब तक नहीं देखा था। बीएचयू के प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के हेड प्रो. ओएन सिंह, प्रो. एके सिंह, डॉ. शांति स्वरुप सिन्हा, डॉ. प्रभाकर उपाध्याय, डॉ. राहुल राज, डॉ. संदीप आदि भी उपस्थित रहे।

शुंग कुषाण कालीन पात्रों के मिले अवशेष
पांचवें दिन के उत्खनन में दूसरे गड्ढ़े में मिट्टी के भग्न बर्तनों में कटोरे, घड़े एवं तसले आदि के अवशेष मिले हैं, जो लाल रंग के है। यहां पर सुराहीदार बर्तन, बोतल के ग्रीवानुमा घड़े, गुलाब पाश (परफ्यूम स्प्रिंकलर) पशुओं की हड्डियां मिली हैं, जो कि शुंग कुषाण कालीन हैं।

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