प्रवासियों का दर्द, न लौटते तो वहां खाये बिना मरते

Updated on: 04 June, 2020 03:23 AM

वहां रहकर अगर कोरोना से बच भी जाते तो शायद बिना खाए मौत हो जाती। क्या करते, घर लौटना मजबूरी थी। ये व्यथा महानगरों से किसी तरह घर लौट रहे मजदूरों की है। इन प्रवासी मजदूरों को न चिलचिलाती धूप दिख रही है, न ही भूख-प्यास। बस एक ही धुन घर पहुंचने की। एनएच-2 पर मोहनसराय के पास डीसीएम, ट्रकों से उतरकर लोग बच्चों संग पैदल ही घरों के लिए निकलने लगे। मोहनसराय से 15 से 20 किमी पैदल चलकर चौकाघाट के पास प्रवासी पहुंचते रहे। उनका कहना है कि कहीं कोई मदद नहीं मिल रही। पास के रुपये, राशन सब खत्म हो गया है।

चौकाघाट चौराहे के पास पहुंचे बलिया के संजय, राजकुमार और पार्वती ने बताया कि वे सभी एक सप्ताह पहले हैदराबाद से निकले हैं। सोचा था कि बस किसी तरह घर पहुंचना है। भले मीलों पैदल ही क्यों न चलना पड़े। इसके लिए खाने-पीने की सामग्री भी रख ली थीं। रास्ते में ट्रक से कुछ दूर चले तो कभी पटरियां पकड़कर पैदल वाराणसी आने के लिए निकल पड़े थे।


नागपुर से रविशंकर और शोभा गाजीपुर के लिए निकले। बताया कि चार दिन पहले निकले थे। वहां कंपनी में काम करते थे। दो महीने से जैसे-तैसे रहे। राशन, रुपये सब खत्म हो गये। अब कुछ दिन और रुकते तो खाने के लिए भी नहीं मिलता। इसीलिए घर की राह पकड़ी। बलिया के निर्मल मुम्बई से बच्चों संग निकले थे। पैदल ही घर के लिए निकल पड़े थे। रास्ते में कहीं किसी वाहन से मदद मिली तो लंबी दूरी पैदल ही चले। हाईवे पर उतरकर यहां तक पैदल आये।

दो दिन से भूखी हूं, दूध उतर नहीं रहा.... बच्चा रो रहा है
चौकाघाट पर सुशीला अपने नवजात बच्चे को चुप करा रही थीं। बच्चा भूख से तड़प रहा था। पूछने पर बताया कि दिल्ली से आए हैं। गाजीपुर जाना है। दो दिन पहले दिल्ली से निकले थे। रास्ते में कुछ खाया नहीं। पानी पीकर यहां तक आये हैं। अब मां को ही दूध नहीं उतर रहा तो बच्चे को क्या पिलाएं। बस किसी तरह घर पहुंचना है।

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